अयोध्या के बाद अब मथुरा और काशी को मस्जिदों से आज़ाद कराने की घोषणा

Updated: Sep 2


एच. एल. दुसाध




राम मंदिर से आगे !


5 अगस्त को बहुप्रतीक्षीत राम मंदिर का भूमि पूजन होने के संग-संग ही एक खास सवाल बुद्धिजीवियों के मध्य उठने लगा था, वह यह कि तीन तलाक के खिलाफ कानून बनने, अनुच्छेद 370 हटने और राम मंदिर के निर्माण का भूमि पूजन होने के बाद आगे क्या ? टीवी चैनलों पर इस सवाल का जवाब देते हुये कुछ राष्ट्रवादी बुद्धिजीवियों ने संकेत कर दिया था कि जनसंख्या नियंत्रण, पाक अधिकृत कश्मीर, काशी और मथुरा इत्यादि कुछ ऐसे मुद्दे है जिन पर काम होता रहेगा और मोदी का वर्तमान कार्यकाल पूरा होने के पहले कुछेक और पाँच अगस्त आ सकते हैं।


हालांकि उनका यह जवाब अप्रत्याशित नहीं था क्योंकि सभी को पता था कि भाजपा जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दे पर काम कर रही है, उसमें काशी और मथुरा की मुक्ति भी उसके एजेंडे हैं। किन्तु इस बात को जानने वालों का यह ख्याल था कि जिस तरह बिना विरोध के राम मंदिर का भूमि पूजन सम्पन्न हुआ है, उससे संघ परिवार से जुड़े लोग कम से कम कुछेक माह तो राम मंदिर निर्माण में चुपचाप लगे रहेंगे, उसके बाद ही कहीं जाकर अगले एजेंडे की घोषणा करेंगे। पर, भूमि पूजन के 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि राम मंदिर के बाद की कर्मसूची का ऐलान हो गया।


संत कर रहे हैं धार्मिक रक्तपात की तैयारी- प्रो. अजय तिवारी


इस पर प्राख्यात आलोचक प्रो. अजय तिवारी ने ‘मथुरा-काशी बाक़ी है’ शीर्षक से फेसबुक पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने लिखा है, ’इधर अयोध्या में राममंदिर निर्माण का शिलान्यास हुआ, उधर अगली लड़ाई का शंखनाद हो गया। जी हाँ, प्रयागराज से आज अखाड़ा परिषद ने घोषणा कर दी है कि अयोध्या के बाद अब मथुरा और काशी को आज़ाद कराने के लिए संघर्ष शुरू किया जायेगा। महंत नरेंद्र गिरि ने बड़ी सद्भावना दिखाते हुए चेतावनी दी है कि मुस्लिम समुदाय स्वेच्छापूर्वक इन स्थलों से मस्जिद हटा ले। बदले में उसे जगह दे दी जायेगी। लेकिन शिव और कृष्ण की भूमि का मुक्त होना ज़रूरी है। ज़मीन तैयार की जाने लगी है। देश अभी कोरोना महामारी से लड़ रहा है और दो सौ से अधिक डॉक्टर संक्रमण के शिकार होकर मौत की नींद सो चुके हैं लेकिन ये ‘संत’ धार्मिक रक्तपात की तैयारी कर रहे हैं। पहले कभी संतों को समाज की चिंता होती थी। अब संत समाज को आग में झोंकने के लिए कमर कस कर तैयार हो रहे हैं।


लोगों के अपार अंधविश्वास के बल पर अकूत संपदा जमा करने वाले ये ‘संत’ सामाजिक कल्याण की बात तो सोच नहीं सकते, समाज को किस तरह आग में झोंकना है, इसके तरीक़े इन्हें बहुत आते हैं। यह ‘साधु समाज’ के राजनीतिकरण का चुभता हुआ उदाहरण है। परसाई जी ने बहुत पहले लिखा था कि एक साधु ने कहा, ‘आंदोलन के लिए विषय बहुत हैं बच्चा!’ अब यह सच दुखद रूप में प्रत्यक्ष हो रहा है। जनता अथाह ग़रीबी से, बेरोज़गारी से, गिरती अर्थव्यवस्था और उससे भी तेज़ी से गिरती नैतिकता से लड़ रही है। राजनीतिक ‘संत’ जनता के धन पर पलते हुए उसी जनता को भाड़ में झोंकने का उद्यम कर रहे हैं। सभ्य समाज का मौन इस संकट को अधिक बढ़ा रहा है। इससे हाल-फ़िलहाल कोई मुक्ति मिलती दिखायी देती है क्या?


प्रो. तिवारी का उपरोक्त पोस्ट राष्ट्र के लिए बहुत बड़ी चेतवानी है। कोरोना महामारी, अथाह गरीबी और बेरोजगारी की पूर्णतया अनदेखी कर संत जिस धार्मिक रक्तपात की जमीन तैयार करने मे लगते दिख रहे हैं, उसे बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत है। अगर राष्ट्र सावधान नहीं हुआ तो जिस तरह रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के फलस्वरूप देश की अपार सम्पदा व प्राण-हानि हुई उसकी पुनरावृति काशी-मथुरा जैसे गुलामी के प्रतीकों की मुक्ति आंदोलन से हो सकती है। प्रो. तिवारी के अनुसार अपार अंधविश्वास के बल पर अकूत संपदा जमा करने वाले इन संतों को समाज को किस तरह आग में झोंकना है, इसके इन्हें बहुत तरीके से आते हैं। अतः काशी-मथुरा बाकी है जैसे नारों को हल्के में न लेते हुये इनके उत्पात से देश को बचाने में जुटना जरूरी है। बहरहाल राष्ट्र अगर संतों के उत्पात से बचना चाहता तो कुछ बुनियादी बातों को ध्यान मे रखना बहुत जरूरी है।


भाजपा की सफलता के पृष्ठ में: गुलामी के प्रतीकों के मुक्ति की पटकथा


सबसे पहले इस बात को ध्यान में रखना है कि भाजपा ने जो अभूतपूर्व राजनीतिक सफलता अर्जित की है, उसके पृष्ठ में आम लोगों की धारणा है कि धर्मोन्माद के जरिये ही उसने सफलता का इतिहास रचा है, जो खूब गलत भी नहीं है। पर, यदि और गहराई में जाये तो यह साफ नजर आएगा कि भाजपा के पितृ संगठन ने सारी पटकथा गुलामी के प्रतीकों के मुक्ति के नाम पर रची और इसका अभियान चलाने के लिए ‘रामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति’ और ‘धर्म स्थान मुक्ति यज्ञ समिति’ इत्यादि जैसी कई समितियां साधु- संतों के नेतृत्व में खड़ी की। संघ ऐसा भारतीय समाज मे साधु-संतों की स्वीकार्यता को ध्यान रखकर किया। साधु-संत हिन्दू समाज में एक ऐसे विशिष्ट मनुष्य –प्राणी के रूप में विद्यमान हैं, जिनके कदमों मे लोटकर राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपति, सीएम से लेकर पीएम तक खुद को धन्य महसूस करते हैं। गुलामी के प्रतीकों की मुक्ति -अभियान में उनकी भूमिका युद्ध के मोर्चे पर अग्रिम पंक्ति में तैनात फ़ौजियों जैसी रही।


साधु- संतों के रामजन्मभूमि जैसे गुलामी के विराट प्रतीक की मुक्ति के अभियान में अग्रिम मोर्चे पर तैनात होने के कारण ही देखते ही देखते यह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में स्वाधीनोत्तर भारत मे सबसे बड़े आंदोलन का रूप अख़्तियार कर कर लिया। साधु- संतों के नेतृत्व में गुलामी सबसे बड़े प्रतीक, रामजन्मभूमि की मुक्ति के नाम पर चले आंदोलन के फलस्वरूप ही भाजपा पहले राज्यों और बाद में केंद्र की सत्ता पर काबिज होते हुये आज राजनीतिक रूप से अप्रतिरोध्य बन गयी है।


जाति/ वर्ण की चिरपरिचित दुर्बलता के शिकार: साधु- संत

बहरहाल भाजपा की सफलता में प्रधान भूमिका अदा करने वाले संतों को लेकर आम से खास जन में यह सवाल बराबर बड़ा आकार लेकर उभरता रहा है कि जो संत जगत को मिथ्या और ब्रह्म को परम सत्य मानकर संसार त्याग कर देते रहे हैं, जागतिक झमेले क्यों पड़ते रहे : वे क्यों चुनावो के समाय हरि-भजन से ध्यान हटाकर रामजन्मभूमि मुक्ति का मामला उठाकर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाते रहे? इसका जवाब भारत के जाति समाज में निहित है। भारत एक ऐसा देश है, जहां के हिन्दू समाज के लोग समग्र वर्ग की चेतना से शून्य होते है और उनकी सोच स्व -जाति/ वर्ण की स्वार्थ सरिता के मध्य विचरण करती रहती है। इसका अपवाद आज तक बड़े से बड़े राजा- महाराजा, लेखक-कलाकार ही नहीं राजा राममोहन राय-विद्या सागर- महात्मा फुले- गांधी- अंबेडकर जैसे महमानव तक न हो सके।


इसी तरह आज तक कोई साधु-संत भी जाति समाज की इस दुर्बलता से पार न पा सका। स्व-जाति/ वर्ण की इसी चिरपरिचित दुर्बलता का शिकार होकर साधु- संत उस संघ के मंदिर मुक्ति अभियानों में अग्रिम पंक्ति में खड़े होने के लिए अभिशप्त रहे, जिसका लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र निर्माण के लिए ब्राह्मणों के नेतृत्व में सवर्णों के हाथ में देश की बागडोर थमाना और शूद्रातिशूद्रों के आरक्षण का खात्मा है।

अब यदि यह जानने का प्रयास करें कि भारतीय साधु-संतों की जाति क्या है तो उसका जवाब होगा, ‘ब्राह्मण’! जी हाँ, साधु-संतो का गिरोह प्रधानतः ब्राह्मणों का गिरोह है, जिसमें कुछेक संख्यक क्षत्रिय और अपवाद रूप से उमा भारती, ऋतंभरा, गिरिराज किशोर, धर्मेन्द्र स्वामी जैसे शूद्र भी मिल जाएंगे। किन्तु अप्रिय सच्चाई यह है कि साधु-संत मुख्यतः ब्रह्मण ही हैं, जिनके हाथ में ही देश की थमाने के लिए ही संघ गुलामी के प्रतीकों के मुक्ति की पटकथा रचते रहता और साधु-सन्त के वेश में छिपे ब्राह्मण स्वतः स्फूर्त रूप से योगदान करते रहते हैं।


गुलामी के प्रतीकों के खड़े होने के लिए ज़िम्मेवार : परजीवी साधु- संत !


बहाहाल यह इतिहास का परिहास ही कहा जाएगा की गुलामी के प्रतीकों की मुक्ति का आंदोलन चलाने वाले इन्हीं संतों के पूर्ववर्तियों ने जाति / वर्ण व्यवस्था का निर्माण कर देश को इतना कमजोर बना दिया कि अतीत में मुट्ठी- मुट्ठी भर विदेशी आक्रांताओं को इस देश को लूट का निशाना बनाने में कोई दिक्कत ही नहीं हुई। पूर्ववर्ती संतों द्वारा बहुजनों के खून-पसीने के गाढ़ी कमाई की अधिकतम सम्पदा देवालयों में जमा करने एवं देवालयों को वेश्यालयों में तब्दील करने के कारण ही इस्लाम आक्रमणकारी हमला करने के लिए ललचाए, जिससे शुरू हुआ गुलामी का सिलसिला। बाद में ईसा के अनुयायियों ने इस सिलसिले को और आगे बढ़ा दिया। फलस्वरूप मुसलमान और ईसाई शासकों के सौजन्य से भवनों, सड़कों, रेल लाइनों, देवालयों, शिक्षालयों, चिकित्सालयों और कल-कारखानों के रूप मे भारत के चप्पे-चप्पे पर गुलामी के असंख्य प्रतीक खड़े हो गये। लेकिन मुसलमान और अंग्रेज़ भारत एक-एक करके खड़े होते उन गुलामी के प्रतीकों को देखकर साधु-संतों का ध्यान कभी भंग नहीं हुआ। वे ब्रह्म सत्य और जगत मिथ्या में आस्था रखते हुये दूध-मलाई , भांग-धतूरों और देवदासियों का भोग लगाने में मस्त रहे।


मण्डल की रिपोर्ट के बाद : चैतन्य हुये साधु-संत


लेकिन जो परजीवी साधु-सन्त मुसलमान और अंग्रेज़ भारत में गुलामी के प्रतीकों से पूरी तरह निर्लिप्त रहे, वे स्वाधीन भारत में मंडलोत्तर काल में देश के सत्ता की बागडोर दलित-पिछड़ों के हाथों में जाते देख चैतन्य हो गये। इसके बाद वे शंकराचार्य, तुलसी, सूर, रामानुज स्वामी, भोलानाथ गिरि, बाबा गंभीरनाथ , तैलंग स्वामी, बामा क्षेपा, रामदास काठिया बाबा जैसे इस्लाम और अंग्रेज़ भारत के संतों की परम्परा का परित्याग कर मिथ्या जगत पर ध्यान केन्द्रित किए। उन्होंने मंडल से उपजी बहुजनों की जाति चेतना का मुक़ाबला धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण से करने के लिए सबसे पहले निशाना बनाया, गुलामी के प्रतीक बाबरी मस्जिद को। बाबरी मस्जिद के टूटने के फलस्वरूप देश-विदेश में टूटे असंख्य मंदिर, टूटा मुंबई का शेयर मार्केट का भवन ।


क्षति हुई बेहिसाब जन और धन की।बाबरी ध्वंस से लेकर आजतक इन परजीवी संतों के कारण राष्ट्र की जो विराट संपदा और प्राणहानि हुई है, उसके सामने असामाजिक तत्वों के सभी गिरोहों का कुकृत्य भी बौना पड़ जाएगा। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर जान-माल की हानि कराकर जिस तरह उन्हों ने ब्राह्मण/ सवर्णों की चैंपियन पार्टी को अप्रतिरोध्य बना दिया है, इससे गुलामी के प्रतीको की उपयोगिता का पहले से कहीं ज्यादा एहसास पैदा हुआ होगा। इसलिए संत के रूप में विद्यमान बहुजन बहुजन- द्रोही भूदेवों का गिरोह भूख-बेरोजगारी, जर्जर अर्थव्यवस्था और कोरोना जैसी महामारी की उपेक्षा कर काशी- मथुरा के मुक्ति का शंखनाद कर दिया है।


लेकिन याद रहें जिस दिन गुलामी के प्रतीकों की मुक्ति आंदोलन के माध्यम से ये साधु – संत संघ परिवार के हिन्दू राष्ट्र का एजेंडा लक्षित बिन्दु पर पहुंचा देंगे, उस दिन से ये फिर हरि –भजन में निमग्न हो जाएंगे।लेकिन तबतक राष्ट्र जहां एक ओर पुराने सांघी दत्तोपंत ठेंगड़ी की भविष्यवाणी के मुताबिक आर्थिक रूप से विदेशियों का गुलाम हो जाएगा, वहीं दलित, आदिवासी, पिछड़ों और अकलियतों से युक्त बहुसंख्य आबादी विशुद्ध गुलामों की स्थिति में पहुँच जाएगी। यह दिन न देखना पड़े , इसके लिए विशुद्ध राष्ट्र-प्रेमी व मानवतावादी ताकतों को काल-बिलंब किए बिना परजीवी साधु- संतों के मंसूबों को ध्वस्त करने में जुट जाना चाहिए।



लेखक एच एल दुसाध हिंदी साहित्यकार तथा बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष

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