क्या वास्तव में औरत की कोई जात नहीं होती ? जाति आधारित बलात्कार हाथरस कांड

अलका निमेश


ग्रामीण परिसरों में, बलात्कार में, जाति किस प्रकार महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है इसे मैंने 2016 में अपने m.Phil के लघु शोध में दर्शाया था, 'हरियाणा के भगाणा बलात्कार कांड' के परिपेक्ष्य में। अब आप सोच रहें होंगे की कि यह केस कब हुआ? हमें तो पता ही नही चला। पता कैसे चलता क्योंकि लाइम-लाइट में ऐसे जाति आधारित बलात्कार भारत में नहीं दर्शाए जाते। हां! निर्भया जैसे केस को ज्यादा अटेंशन मिलता है और मिलना भी चाहिए ताकि ऐसे अपराध कभी ना हो महिलाएं स्वतंत्र और बैखौफ जी सके। खैर, मैं बात जाति अधारित बलात्कार की कर रही थी। गांवो में दो समुदायों के बीच हल्की फुल्की झाड़ झड़प का बदला सवर्ण समुदाय अवर्ण समुदाय की महिलाओं से बलात्कार करके लेता है। बलात्कार एक सबक सिखाने के रूप में कैसे इस्तेमाल किया जाता है यह वे लोग भलीभांति जानते है जिनकी नज़रों में कास्ट इग्ज़िस्ट ही नहीं करती। लेकिन जानबूझकर वे इस तथ्य को झुठलाते रहें हैं और आज भी झुठला रहें हैं।


बलात्कार भी कई तरह के होते हैं, एक वो जो अपनी यौनिक कुंठा को मिटाने के लिए किए जाते है साथ ही इसमें स्त्रियों को अपनी हद में रहने का सबक़ सिखाने का उद्देश होता है। जैसा कि निर्भया केस में हमने देखा। दूसरा वह जहां यौनिक कुंठा को मिटाना दूसरा उद्देश्य हो सकता है परंतु प्रथम उद्देश्य स्त्री के साथ साथ पूरे समुदाय और समस्त जाति को यह सबक सिखाने के लिए किया जाता है, कि अगर हमारे सामने सर उठाने की या खिलाफ बोलने की हिमाकत की तो अंजाम यही होगा। ऐसी घटनाओं की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है। ऐसे जाति आधारित बलात्कार में दो चीज़े साथ-साथ चलती हैं, पहली, लड़की के आत्मसम्मान को चकनाचूर करने के साथ साथ समस्त समुदाय के आत्मसम्मान को तार तार कर दिया जाता है, क्योंकि आप ही महिला की इज्ज़त को समाज से जोड़कर देखते हैं। दूसरा, मनोरंजन स्वरूप हवस भी मिटा ली जाती है। हरियाणा के भगाणा बलात्कार कांड में भी कुछ ऐसा ही हुआ था और भगाणा ही क्यूं इससे पहले भंवरी केस, खैरलांजी, मथुरा, फूलन और ना जाने कितने ही से केसेस हुए। भगाणा मामले में शासन, प्रशासन, पंचायत और मीडिया की उदासीनता स्पष्ट तौर पर देखने को मिलती है और ना केवल भगाणा बल्कि ऊपर जिक्र किए गए सभी मामलों में ऐसा ही देखने को मिलता है (दलित महिला के बालात्कार के संदर्भ में) ।


'बलात्कारी कि कोई जाति नहीं होती', 'caste पर मत बोलो' , 'जाति को बीच में मत लाओ' कुछ सवर्ण अपनी घटिया और कीचड़नुमा मानसिकता से बार बार यही कह रहें हैं। आपको अंदाज़ा भी नहीं की आपकी यही कीचड़ नुमा मानसिकता कितनी सड़ांध फैला रही हैं, इतनी कि इसे सह पाना मरने जैसा है। आप यह स्वीकार क्यूं नहीं करते कि आप जाति का घमंड लिए इस समाज में जीते हैं। चलिए ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले बलात्कारों के बारे में बात करते हैं। जितने भी बलात्कार ग्रामीण क्षेत्रों में होते हैं उन आंकड़ों में दलित महिलाएं ही शीर्ष पर क्यों होती है? और बलात्कार करने वाले पुरुषों में सवर्ण पुरुषों का आंकड़ा ही शीर्ष पर क्यों रहता है ? क्या ये सवाल जहन में नहीं उठते? उठते तो होंगे ही लेकिन क्या हैं ना की जाति के उपर खतरा मंडरा जाता है इसलिए जैसे भी हो इस तरह के प्रश्न ना ही उठे तो ही बेहतर है। मामले रफा दफा कर दिए जाए तो ही ठीक है नहीं तो हमारी जात का मान, स्वाभिमान खतरे में नहीं आ जाएगा ? तो हम क्यों बोले ऐसे मामलों पर! जितनी जल्दी हो मामला रफा दफा हो तो ही ठीक है।

ऐसे मामलों को रफा दफा करने वाले प्रपंची तर्को पर भी थोड़ी बात कर लेते हैं :

1. " एक सवर्ण पुरुष दलित महिला से बलात्कार नहीं कर सकता क्योंकि पुरुष सवर्ण हैं और महिला ' अछूत '। (राजस्थान कोर्ट का यह स्टेटमेंट आया था भंवरी देवी केस पर)

2. "दलित महिला ने झुठा केस दर्ज कराया है । (जबकि रिपोर्ट दर्ज कराने गई महिला के साथ पुलिस ने भी रेप किया था "मथुरा रेप केस")

3. "लड़की का पहले से प्रेम प्रंसग चल रहा था और जो हुआ सहमति से हुआ।" (भगाणा रेप केस)

4. "बालात्कार हुआ ही नहीं ना रीड़ की हड्डी तोड़ी गई और ना ही जबान काटी गई यह सब कुछ झूठ है मामले को जातिगत रंग दिया जा रहा है यह सब बेकार की बातें बंद करो। "(हाथरस रेप केस)

ऐसे तमाम तर्क उन सवर्णों द्वारा दिए जाते हैं जो आज तक अपनी जाति से ऊपर उठकर मानवता को नहीं देख पाए। बालात्कार को ही नकार देना, घटना को ही झुठला देना आपके मनुष्य ना होने का प्रमाण देता है प्रशासन आनन फानन में आधी रात को शव इसलिए जला डालता है ताकि वह यह कह सके की बलात्कार जैसा कुछ हुआ ही नहीं। यह सब झूठ है। इन सभी के बावजूद सवर्ण समाज का एक तबका ऐसा है जिसके कान पर जूं तक नहीं रेंगती। जूं, कीड़े मकोड़े कान खजुरे और यहां तक कि ये बड़े बड़े खतरनाक सांप भी रेंगे थे जब मोहतरमा कंगना जी का ऑफिस मुम्बई महानगर पालिका द्वारा तोड़ा गया था।

आज भी याद है मुझे वो दिन जब समस्त देश निर्भया को न्याय दिलाने के लिए सड़कों पर उतरा था, जगह जगह कैंडल मार्च हुए थे। क्या राष्ट्रीय क्या अंतरराष्ट्रीय सभी जगह इस जघन्य अपराध की भर्त्सना हुई थी। निर्भया केस में दलितों ने बढ़ चढ़ कर निर्भया के लिए न्याय की मांग की थी। अपने लेखों, शोध कार्यों के माध्यम से दलित शोधार्थी लगातार निर्भया के लिए न्याय की मांग करते रहे थे। लेकिन जब बात दलित महिला के बलात्कार की आती है तो जैसे मानो देश में रह रहा सवर्ण समुदाय पूर्णतः गूंगा, बहरा और अंधा, बल्कि षडयंत्रकारी भी हो जाता है। फिर ऐसे मामलों को जाति को बढ़ावा देने वाले मामले बता कर पल्ला झाड़ लिया जाता है।

सवर्ण परिषद् का अपराधियों के पक्ष में आना, उनके घोर जातिवादी होने को प्रमाणित करता है। शर्म आनी चाहिए उन्हें जो ऐसे अपराधियों को बचाने की आप पैरवी करते हैं। महिला आयोग जैसी संस्थाएं कुंभकर्ण की भांति निद्रा का आनंद ले रही होती हैं समस्त मीडिया या तो गूंगी हो जाती है या उन प्रपंची तर्को को पेश करती है जिसकी चर्चा अभी ऊपर लेख में की गई है। साथ ही कुछ अंधभक्त तो इसलिए जबान पर ताला लगा लेते हैं कि कहीं उनके समर्थित राजनीतिक दल को घेर लिया न जाए, इसलिए वे चुप्पी साधना ही बेहतर समझते हैं।इस लिहाज से देश का सवर्ण समुदाय स्वयं अपने जातिवादी होने का परिचय देता है। अभी हाथरस का मामला लोगो के सामने आया ही था की अचानक बलरामपूर का केस सामने आया और एक के बाद एक दलित महिलाओं के, बच्चियों के बलात्कार के मामले उत्तर प्रदेश से हर रोज़ सामने आ रहे है। अपने इस जीवन काल में ना जाने और कितने भवरी, मथुरा, भगाणा और हथरस केस देखने होंगे और कब तक?

लेखिका अलका निमेष यह दिल्ली विश्ववद्यालय के राजनीतिक विज्ञान विभाग में

पीएचडी शोधार्थी है।

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