नाग पंचमी का प्राचीन इतिहास

भिक्खुनी विजया मैत्रीय

( प्रस्तुत लघु लेख ' राजा बलि हमार है ' इस किताब से लिया अंश है)





नागपंचमी भारत के बहुजनों में मनाया जाने वाला एक पारंपारिक त्योहार है। वैसे इसे हिन्दुओं का त्योहार कहा जाता है क्योकि मूलनिवासी बहुजन ही इस त्योहार को सदियो से मनाते रहे है और वर्तमान में उन्हें हिन्दु कहा जाता है। इस त्योहार में सभी बहुजन भारतीय नागों की पूजा करते है। किंतु असली नागों की नहीं बल्कि दिवारों पर नागों का चित्र निकाल कर उसकी पूजा करते है। कुछ उत्साही लोग असली नाग को भी दूध पिलाने का दुस्साहस करते है, ंिकंतु वे नहीं जानतंे कि सर्प को दूध पिलाने से उन्हें अपचन होकर उनकी जान भी जाती है। इस पर हिन्दु धर्म के ठेकेदार अपना विषेश ज्ञान बताते हुये कहते है कि षास्त्रों में नागदेवता को दूध से नहलाने की बात कही गई है, पिलाने की नहीं, साथ ही वे यह भी जानते है कि असली सर्प को तो नहलाया नहीं जा सकता इसलिये लिख दिया कि श्धातु से बने या तांबे से बने सर्प की मूर्ति को दूध से नहलाओ।


नागपंचमी के ही दिन अनेकों गांव और कस्बों में कुष्ती का आयोजन होता है जिसमें पहलवान भाग लेते हैं। भारत में पहलवानों और कुष्ती आखाड़ों का इतिहास बहुजन असुरों से ही जुड़ा रहा है। माहाराष्ट्र में महारोंए चमारों और अन्य पिछड़ी जातियों के, उत्तर में बलाईयों, मेघवारों तथा जाटवों के अखाड़े प्रसिद्ध रहे है।


वास्तव में नागपंचमी का संबंध मूलनिवासी बहुजनों से ही रहा है, क्योंकि भारत के प्राचीन मूलनिवासी असूर नागवंषिय थे, उनका टोटम नाग था। इसलिये यहाॅं के असुर राजाओं को नागराजे कहा गया तथा उनके वंषजों को नागवंषीय कहा गया। किंतु षब्दों का भ्रमजाल फैलाकर नागवंषीय राजाओं को सरपटनेवाले नाग बताया जाता रहा। पुराणों तथा अन्य षास्त्रों में ही इसका प्रमाण मिलता है- वासुकिः तक्षकष्च्ैव कालिया मणिभद्रकः। ऐरावतो धृतराश्टः कार्कोटकधनंजयौ।। एतेऽभयं प्रयच्छन्ति प्राणिनां प्राणजीविनाम्।। - भविश्योत्तरपुराण- 32-2-7 इसका अर्थ है, वासुकि, तक्षक, कालिया, मणिभद्रक, ऐरावत, धृतराश्ट, कार्कोटक और धनंजय ये प्राणियों को अभय प्रदान करते है। इसके भावार्थ से ही समझ में आता है कि कोई सर्प किसी को अभय कैसे दे सकता है। अभय तो राजा ही दे सकते है।



वासुकि, तक्षक, कालिया आदि सभी नागवंषीय राजा थे इसके अनेक प्रमाण प्राचीन इतिहास में मिलते है। कहते है, वाराणसी में एक नाग कुआॅं नामक स्थान है जहाॅं नागपंचमी के दिन बहुत बड़ा मेला लगता है। इस बारे में एक किवदंती प्रसिद्ध है- इस स्थान पर तक्षक, गरूड़जी के भय से बालक रूप में संस्कृति की षिक्षा लेने आये थे। किंतु गरूड़जी को इसकी जानकारी हो गयी और उन्होंने तक्षक पर हमला कर दिया, किंतु गुरूजी के प्रभाव से गरूड़ जी ने तक्षक नाग को अभय दान कर दिया, उसी समय से यहाॅं नागपंचमी के दिन नाग पूजा की जाती है।


इतिहास गवाह है कि नागवंषीय राजा तक्षक की राजधानी तक्षषिला थी जहाॅं तक्षषिला नामक विद्यापिठ भी था। उपर्युक्त पुराण का संदर्भ कहता है कि तक्षक ने अन्य प्राण्यिों को अभय दिया था और किवदंती बिल्कुल उल्टी बात कह रही है। यदि तक्षक भयभीत होता और उसे गरूड़राज अभय देता तो पूजा गरूड़ की होती नाग की नहीं। इस विष्लेशण से यह स्पश्ट होता है कि नागराजा को किवदंतियों में बदनाम किया गया है। कोषिष तो यही रही होगी कि लोग गरूड़ की पूजा करें क्योंकि गरूड़ विश्णु का वाहन है और विश्णुदेव तथा नागवंषीय असुरों का सदा से षत्रुत्व रहा है। किंतु उन्हें इस चाल में कामयाबी नहीं मिली। जैसे भारत के मूलनिवासियों ने बली का नाम लेना नहीं छोड़ा, षंकर को पूजना नहीं छोड़ा। जिन बातों को ब्राह्म्णवादी मूलनिवासी बहुजनों के मानसपटल से निकाल नहीं पाये कालांतर में उन्होंने उन बातों को हिन्दू धर्म का हिस्सा कहकर स्वीकार कर लिया। जिसे वे ब्राह्म्णों के ह्दय की विषालता का नाम देते है।

नाग की पूजाए उनसे डर के कारण नहीं की जाती बल्कि असुरों का टोटम नाग होना इसका महत्वपूर्ण कारण है नागों या सर्पो से मनुश्य को होने वाला लाभ। भारत के प्रागैतिहासिक प्रमाणों से ज्ञात होता है कि यहाॅं के प्राचीन मूलनिवासियों जिन्हें असुर, अहि या द्रविड़ कहा गया उन्होंने कृशि का आविश्कार किया था। तभी से भारत कृशिप्रधान देष रहा है। इन खेतों की सुरक्षा का काम सर्प करते है, इसलिए उन्हें क्षेत्रपाल भी कहा गया है। ये सर्प खेतों को नुकसान पहंुचाने वाले जीव-जंतुओं को खतम करते है। जिससे खेतो की ज़मीन उर्वर होतु है और इस तरह नाग या सर्प खेतों को सुरक्षा प्रदान करते है। यही कारण है कि नाग पूजा का बहुजनों की संस्कृति में महत्चपूर्ण स्थान है। अब इस उत्सव को हिन्दू त्योहार में बदल दिया गया है।


भिक्खुनी विजया मैत्रीय यह हिंदी साहित्यकार है,

इनकी ' भारतीय मूलनिवासी और आरक्षण ' - सम्यक प्रकाशन, दिल्ली

' बुद्ध शिक्षण बनाम वैदिक शिक्षा ' - सम्यक प्रकाशन, दिल्ली, सहित और तीन किताबे प्रकाशित हुई है।

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