बहुजन कैसे लड़ें अपनी आज़ादी की लड़ाई !

एच एल दुसाध





आज़ादी के सपने !


आज 15 अगस्त है, भारत का स्वाधीनता दिवस! 73 साल पूर्व आज ही के दिन भारत के लोग विदेशियों की हजारों साल लंबी गुलामी झेलकर आज़ाद हुये थे। 1947 का यह दिन था भारत के निर्माण का, हर प्रकार की विषमता से पार पाने का संकल्प लेने तथा उस संकल्प को पूरा करने का। इस विषय में ‘आज़ादी के बाद का भारत’ नामक ग्रंथ में सुप्रसिद्ध इतिहासकार विपिन चंद्र- मृदुला मुखर्जी- आदित्य मुखर्जी ने बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है. उन्होने लिखा है ‘भारत की आज़ादी इसकी जनता के लिए एक ऐसे युग की शुरुआत थी, जो एक नए दर्शन से अनुप्राणित था। 1947 में देश अपने आर्थिक पिछड़ापन, भयंकर गरीबी, करीब-करीब व्यापक तौर पर फैली महामारी, भीषण सामाजिक विषमता और अन्याय के उपनिवेशवादी विरासत से उबरने के लिए अपनी लंबी यात्रा की शुरुआत थी। 15 अगस्त पहला पड़ाव था, यह उपनिवेश राजनीतिक नियंत्रण में पहला विराम था। शताब्दियों के पिछड़ेपन को अब समाप्त किया जाना था, स्वतन्त्रता के वादों को पूरा किया जाना था। भारतीय राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था तथा राष्ट्रीय राजसत्ता को विकास एवं सामाजिक रूपान्तरण के उपकरण के रूप में विकसित एवं सुरक्षित रखना सबसे महत्वपूर्ण काम था। यह महसूस किया जा रहा था कि भारतीय एकता को आँख मूंदकर मान नहीं लेना चाहिए। इसे मजबूत करने के लिए यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत में अत्यधिक क्षेत्रीय, भाषाई, जातीय एवं धार्मिक विभिन्नताएँ मौजूद हैं। भारत की बहुतेरी अस्मिताओं को स्वीकार करते एवं जगह देते हुये तथा देश के विभिन्न तबकों को भारतीय संघ में पर्याप्त स्थान देकर भारतीयता को और मजबूत किया जाना था।


यह सपना है उस आज़ाद भारत का जिसे 16 अगस्त, 1947 के ही दिन से मूर्त रूप देने में जुट जाना था। पर, आजादी के 73 सालों बाद क्या हुआ उस सपने का और क्या है उसका वास्तविक चित्र? आज भले ही देश विश्व आर्थिक महाशक्ति बनने का दावा करे पर, सच्चाई है रोग-व्याधि, अशिक्षा के मामले मे हम विश्व चैंपियन है। जिस लोकतन्त्र हमारे गर्व का अंत नहीं है, उस लोकतन्त्र के मंदिर पर 2050 तक बंदूक के बल पर कब्जा जमा लेने की चुनौती एक तबके की ओर से दी जा चुकी है। विभिन्न अंचलों में छोटे-बड़े राज ठाकरों का उदय देश की अखंडता को चुनौती पेश कर रहा है। हम महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर बांग्लादेश, नेपाल इत्यादि अत्यंत पिछड़े प्रतिवेशी मुल्कों से भी पीछे हैं। सच्चर रिपोर्ट में उभरी मुस्लिम समुदाय के बदहाली की तस्वीर राष्ट्र को सकते में डाल चुकी है।


शासकों ने किया संविधान निर्माता के चेतावनी की अनदेखी


सबसे दुखद बात तो यह है कि 25 नवंबर,1949 को राष्ट्र को संविधान सौपने के एक दिन पूर्व संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ. अंबेडकर मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या, ‘आर्थिक और सामाजिक विषमता’ से पार पाने के लिए राष्ट्र को जो चेतावनी दी थी, उसकी भी शासकों ने बुरी तरह अनदेखी कर दिया। स्मरण रहे डॉ. अंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संसद के केंद्रीय कक्ष से राष्ट्र को सावधान करते हुये कहा था कि 26 जनवरी 1950 से हम एक विपरीत जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति के क्षेत्र में हम समानता का भोग करेंगे, किन्तु आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में मिलेगी भीषण असमानता। हमें इस असमानता को निकटतम भविष्य के मध्य खत्म कर लेना होगा नहीं तो विषमता से पीड़ित जनता लोकतन्त्र के उस ढांचे को विस्फोटित कर सकती है, जिसे संविधान निर्मात्री सभा ने इतनी मेहनत से तैयार किया है। अगर बाकी बातें भूलकर स्वाधीन भारत के हमारे शासक सिर्फ और सिर्फ आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे के मोर्चे पर सर्व-शक्ति लगाया होता, आज़ादी के सपनों को हासिल कर लिए होते। किन्तु इसके लिए उन्हे शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करनी पड़ती अर्थात शक्ति के स्रोतों का सवर्ण, ओबीसी, एससी/एसटी और धामिक अल्पसंख्यकों के मध्य वाजिब बंटवारा करना पड़ता।


किन्तु लोकतन्त्र के ढांचे के विस्फोटित होने कि संभावना को देखते हुये भी हमारे शासक, जो जन्मजात विशेषाधिकारयुक्त व सुविधाभोगी वर्ग अर्थात सवर्ण वर्ग से रहे, अपने स्व- वर्गीय हित के हाथों मजबूर होकर विभिन्न सामाजिक समूहों के मध्य शक्ति के स्रोतों का वाजिब बंटवारा कराने की दिशा में अग्रसर न हो सके। किन्तु शक्ति के स्रोतों का वाजिब बंटवारा न कराने के बावजूद भी 7 अगस्त, 1990 को मण्डल कि रिपोर्ट प्रकाशित होने के पूर्व तक भारत के जन्मजात वंचितों के प्रति कुछ- कुछ सदय बने रहे, इसलिए संविधानगत कुछ-कुछ अधिकार देकर शक्ति के स्रोतों में प्रतीकात्मक ही सही कुछ-कुछ शेयर देते रहे।


किन्तु मण्डल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के अगले दिन से वंचितों के प्रति उनकी करुणा शत्रुता में बदल गई और वे शक्ति के स्रोतों से वाचितों को दूर धकेलने का षड्यंत्र में लिप्त हो गए। बाद मे 24 जुलाई, 1991 को वंचितों को संवधानिक अवसरों से महरूम करने के लिए नरसिंह राव ने भारत की धरती पर लागू कर दिया नवउदरवादी अर्थनीति, जिसे उनके बाद अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह ने भी आगे बढ़ाने में कोई कमी नहीं की। किन्तु, इस मामले में किसी ने सबको बौना बनाया तो वह हैं वर्तमान प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी।


स्वाधीनता की 74 वें सालगिरह पर: बहुजनों के समक्ष आज़ादी की लड़ाई मे उतरने से भिन्न नहीं है कोई विकल्प !




जिस नवउदारवादी नीति की शुरुआत नरसिंह राव ने किया एवं जिसे भयानक हथियार के रूप इस्तेमाल किया मोदी ने, उसके फलस्वरूप आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में भारत के सवर्णों जैसा शक्ति के स्रोतों पर पर औसतन 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा नहीं है. आज यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स जन्मजात सुविधाभोगी सवर्णों के हैं. मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकाने इन्हीं की है। चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाड़ियां इन्हीं की होती हैं। देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल प्राय इन्ही के हैं। फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है. संसद, विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का है।


मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं। न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया,धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के सवर्णों जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया में कहीं नहीं है। आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधाभोगी वर्ग का ऐसा दबदबा नहीं है। इस दबदबे ने बहुसंख्य लोगों के समक्ष जैसा विकट हालात पैदा कर दिया है, ऐसे से ही हालातों में दुनिया के कई देशों में शासक और गुलाम वर्ग पैदा हुए, ऐसी ही परिस्थितियों में दुनिया के कई देशों में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए। ऐसे ही हालातों में अंग्रेजों के खिलाफ खुद भारतीयों ने स्वाधीनता संग्राम छेड़ा था। अतः आज विगत 73 सालों से आज़ादी के सुफल से वंचित बहुजनों के समक्ष अपनी मुक्ति की लड़ाई में उतरने का संकल्प लेने से भिन्न कोई विकल्प ही नहीं बचा है।

हिन्दू राष्ट्र के आईने में बहुजनों के लिए और जरूरी हो गया है आज़ादी की लड़ाई में उतरना !


आज की तारीख में बहुजनों को इस बात में रत्ती भर भी संदेह नहीं रहना चाहिए कि मोदी तीन तलाक कानून, अनुच्छेद 370 का खत्मा, राम मंदिर निर्माण इत्यादि संघ के खास –खास एजेंडों को लागू कर चुके हैं और उनका शेष लक्ष्य रह गया है, हिन्दू राष्ट्र की घोषणा । ऐसा होने पर भारत आंबेडकर के संविधान की जगह उन हिन्दू धर्माधारित क़ानूनों द्वारा द्वारा परिचालित होगा, जिसमे शूद्रातिशूद्रों के लिए शक्ति के स्रोतों का भोग अधर्म घोषित किया गया है। हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को मूर्त रूप देने के लिए ही मोदी सारा कुछ-सरकारी कंपनियाँ, बैंक, रेल, हवाई और बस अड्डे इत्यादि - निजी हाथों में देने के लिए जुनून की हद तक आमादा हैं। इस बात का इल्म आम लोगों को भलें ही न हो, किन्तु विद्वानों को हो चुका है। इसे देखते हुये ही किसी विद्वान ने सोशल मीडिया पर निम्न टिप्पणी की है।


मोदी राज में हो रहा है : भारत का रियासतीकारण !


‘मात्र 70 साल में ही बाजी पलट गई. जहाँ से चले थे उसी जगह पहुंच रहे हैं हम। फर्क सिर्फ इतना है कि दूसरा रास्ता चुना गया है और इसके परिणाम भी ज्यादा गम्भीर होंगे।


1947 जब देश आजाद हुआ था, नई नवेली सरकार और उसके मंत्री देश की रियासतों को आजाद भारत का हिस्सा बनाने के लिए परेशान थे।तकरीबन 562 रियासतों को भारत में मिलाने के लिए साम- दाम- दंड- भेद की नीति अपना कर अपनी कोशिश जारी रखे हुए थे, क्योंकि देश की सारी संपत्ति इन्हीं रियासतों के पास थी। कुछ रियासतों ने नखरे भी दिखाए, मगर कूटनीति और चतुरनीति से इन्हें आजाद भारत का हिस्सा बनाकर भारत के नाम से एक स्वतंत्र लोकतंत्र की स्थापना की। और फिर देश की सारी संपत्ति सिमट कर गणतांत्रिक पद्धति वाले संप्रभुता प्राप्त भारत के पास आ गई।धीरे-धीरे रेल, बैंक, कारखानों आदि का राष्ट्रीयकरण किया गया और एक शक्तिशाली भारत का निर्माण हुआ।


मात्र 70 साल बाद समय और विचार ने करवट ली है। फासीवादी ताकतें पूंजीवादी व्यवस्था के कंधे पर सवार हो राजनीतिक परिवर्तन पर उतारू है। लाभ और मुनाफे की विशुद्ध वैचारिक सोच पर आधारित ये राजनीतिक देश को फिर से 1947 के पीछे ले जाना चाहती है.यानी देश की संपत्ति पुनः रियासतों के पास! लेकिन ये नए रजवाड़े होंगे कुछ पूंजीपति घराने और कुछ बड़े बड़े राजनेता। निजीकरण की आड़ में पुनः देश की सारी संपत्ति देश के चन्द पूंजीपति घरानो को सौंप देने की कुत्सित चाल चली जा रही है। उसके बाद क्या?


निश्चित ही लोकतंत्र का वजूद खत्म हो जाएगा। देश उन पूंजीपतियों के अधीन होगा जो परिवर्तित रजवाड़े की शक्ल में सामने उभर कर आयेंगे।


‘उपरोक्त हालात क्या आँख में अंगुली डाल कर यह नहीं बताते कि आज की तारीख में बहुजनों के समक्ष एक नए स्वतन्त्रता संग्राम मे कूदने से भिन्न कोई विकल्प ही नहीं बचा है!


बहुजनों में पनप रही है ' हम भावना' !


ऐसे में दावे के साथ कहा जा सकता है कि भारत की जन्मजात आबादी में सापेक्षिक वंचना का जो अहसास जन्मा है, उससे वोट के जरिये लोकतान्त्रिक क्रांति के जो हालात आज भारत में पैदा हुए हैं, वैसे हालत विश्व इतिहा में कभी किसी देश में उपलब्ध नहीं रहे. इस हालात में परस्पर शत्रुता से लबरेज मूलनिवासी समुदायों में क्रांति के लिए जरुरी ‘हम-भावना’(we-ness) का तीव्र विकास का तीव्र विकास हुआ। कॉमन वंचना ने बहुजनों को शक्तिसंपन्न वर्गों के विरुद्ध ‘हम-भावना’ से लैस करना शुरू कर दिया है। इस भयावह विषमता का सदव्यवहार कर बहुजन साहित्यकार वोट के जरिये क्रांति घटित करने लायक हालात बनाने में जुट गए हैं। इससे मूलनिवासियों में सापेक्षिक वंचना का जितना लम्बवत विकास हुआ है, उससे दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासियों की भांति भारत के मूलनिवासियों की तानाशाही सत्ता कायम होने की संभावना उज्ज्वलतर हो गयी है।


लेखक एच एल दुसाध हिंदी साहित्यकार है तथा डायवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष है







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