बहुजन मुक्ति की लड़ाई का मॉडेल बने: रूस-चीन नहीं, दक्षिण अफ्रीका!

एच एल दुसाध




वैसे तो जिन हालातों में सारी दुनिया में क्रांतियां हुईं, स्वाधीनता आन्दोलन संगठित हुए, भारत में वे सारे हालात विगत छः सालों में बड़ी तेजी से पूंजीभूत हो चुके हैं। अब यहाँ प्रश्न उठता है कि बहुजन अपनी मुक्ति के लिए किस देश को मॉडल बनायें? कभी इस देश में वंचितों की लड़ाई लड़ने वाले संगठन रूस और चाइना को मॉडल बनाते रहे। ऐसे लोगों की संख्या में आज भारी कमी जरुर आई है, किन्तु रूस और चाइना की खूनी क्रांतियों से प्रेरणा लेकर बन्दूक के बल पर सत्ता कब्जाने का सपना देखने वालों से यह देश आज भी पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। लिहाजा खूनी क्रांति के जरिये शोषकों से पार पाने का सपना देखने वाले आज भी मौजूद हैं। लेकिन याद रहे जिन लोगों ने भारत में खूनी क्रान्ति का मुहिम चलाया है, वे सवर्ण समुदाय से रहे। उन्होंने वोट के जरिये भारत मे घटित होने वाली लोकतान्त्रिक क्रांति के अनुकूलतम हालात को व्यर्थ करने के लिए खूनी क्रांति का आह्वान किया और निरीह वंचित युवाओं को इससे जोड़ा भी।


बहरहाल मोदी राज में जिनको जन्मजात शोषकों के खिलाफ संगठित होने के लिए विवश होना पड़ रहा है, उनकी मानसिकता फुले, शाहू जी, पेरियार, डॉ.आंबेडकर, कांशीराम, जगदेव प्रसाद, रामस्वरुप वर्मा इत्यादि के समतावादी विचारों से पुष्ट है। लोकतंत्र और भारतीय संविधान में अपार आस्था रखने वाले ये लोग ईवीएम में क्रांति के जरिये सत्ता दखल कर अपनी वंचना से मुक्ति पाना चाहते हैं। लिहाजा इनके लिए चीन और रूस जैसे देश मॉडल नहीं बन सकते। ऐसे में सवाल पैदा होता है अगर रूस और चीन नहीं तो फिर किस देश को मॉडल बनाकर भारत के जन्मजात वंचित अपनी मुक्ति की लड़ाई लड़ें? मेरा जवाब है दक्षिण अफ्रीका और सिर्फ दक्षिण अफ्रीका! हालाँकि विविधतामय अमेरिका भी बहुजनों के लिए मॉडल के रूप में चिन्हित हो सकता है, जिससे प्रेरणा लेकर वे वोट के जरिये क्रांति घटित कर अपनी समस्यायों का हल ढूंढ सकते हैं। किन्तु इस मामले में दक्षिण अफ्रीका का कोई तोड़ नहीं है।

भारत और दक्षिण अफ्रीका में कितनी समानता !


स्मरण रहे दक्षिण अफ्रीका विश्व का एकमात्र ऐसा देश है, जिसकी भारत से सर्वाधिक साम्यताएं हैं। दक्षिण अफ्रीका में 9-10 प्रतिशत अल्पजन गोरों, प्रायः 79 प्रतिशत मूलनिवासी कालों और 10-11 प्रतिशत कलर्ड (एशियाई उपमहाद्वीप के लोगों) की आबादी है। वहां का समाज तीन विभिन्न नस्लीय समूहों से उसी तरह निर्मित है जैसे विविधतामय भारत समाज अल्पजन सवर्णों, मूलनिवासी बहुजनों और धार्मिक अल्पसंख्यकों से। जिस तरह दक्षिण अफ्रीका में विदेशागत गोरों का शक्ति के स्रोतों पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा रहा है, ठीक उसी तरह भारत में 15 प्रतिशत सवर्णों का 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा कायम है। जिस तरह दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासी बहुसंख्य हो कर भी शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह बहिष्कृत रहे, प्रायः वैसे ही भारत के मूलनिवासी दलित, आदिवासी, पिछड़े और इनसे धर्मान्तरित तबके भी हैं। जिस तरह दक्षिण अफ्रीका में सभी स्कूल, कॉलेज, होटल, क्लब, पॉश कालोनियां, रास्ते मूलनिवासी कालों के लिए मुक्त नहीं रहे, प्रायः वही स्थिति भारत के मूलनिवासियों की रही। जिस तरह दक्षिण अफ्रीका में सभी सुख-सुविधाएं गोरों के लिए सुलभ रही, उससे भिन्न स्थिति भारत के सवर्णों की भी नहीं रही।


जिस तरह दक्षिण अफ्रीका का सम्पूर्ण शासन तंत्र गोरों द्वारा गोरों के हित में क्रियाशील रहा, ठीक उसी तरह भारत में शासन तंत्र हजारों साल से सवर्णों द्वारा सवर्णों के हित में क्रियाशील रहा है और आज भी है। इन दोनों ही देशों में मूलनिवासियों की दुर्दशा के मूल में बस एक ही कारण प्रमुख रूप से क्रियाशील रहा और वह है शासक वर्गों की शासितों के प्रति अनात्मीयता। इसके पीछे शासकों की उपनिवेशवादी सोच की क्रियाशीलता रही। दक्षिण अफ्रीका के गोरों ने जहां दो सौ साल पहले उपनिवेश कायम किया, वहीं भारत के आर्यों ने साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व। दक्षिण अफ्रीका के विदेशागत गोरे शासकों ने जहां बन्दूक की नाल पर पुष्ट कानून के जरिये मूलनिवासियों को जानवरों जैसी स्थिति में पड़े रहने के लिए विवश किया, वहीं भारत के मूलनिवासियों को मानवेतर प्राणी में तब्दील व अधिकारविहीन करने के लिए प्रयुक्त हुआ धर्माधारित कानून, जिसमें मोक्ष को जीवन का चरम लक्ष्य घोषित करते हुए ऐसे–ऐसे प्रावधान तय किये गए, जिससे मूलनिवासी चिरकाल के लिए शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत होने के साथ ही निःशुल्क-दास में परिणत होने के लिए अभिशप्त हुए। किन्तु अब भारत और दक्षिण अफ्रीका में पहले वाली साम्यताएं नहीं रही। आज दक्षिण अफ्रीका के शासक और शासित वर्ग उलट चुके हैं, जबकि भारत में स्थिति पूर्ववत है।


अब आज़ादी का सुख भोग रहे हैं: दक्षिण अफ़्रीकी मूलनिवासी


वर्ष 1996 में एक गणतंत्र के रूप में स्वयं को पुनर्गठित करने के बाद दक्षिण अफ्रीका ने दो ऐसे विधान बनाये जो कोई अन्य देश नहीं बना सका। वे हैं, पहला: समानता और अनुचित भेदभाव का रोकथाम अधिनयम 2000 और दूसरा: रोजगार समानता अधिनियम 1998। इन कानूनों ने वहा चमत्कार कर डाला। अनुचित भेदभाव रोकथाम अधिनियम 2000 में गोरे शासन में मूलनिवासी कालों और महिलाओं पर सदियों से चले आ रहे भेदभावकारी कानूनों का सम्पूर्ण रूप से उच्छेद कर ऐसे कानून बनाये गए हैं, जिनसे अनुचित भेदभाव और प्रताड़ना रुके, समानता को बढ़ावा मिले, अनुचित भेदभाव समाप्त हो, घृणा उत्पन्न करने वाले संभाषण पर रोक लगे। भेदभाव पर रोक लगाने वाले कानून इतने कठोर हैं जिस तरह भारतीय संविधान में अस्पृश्यता के उन्मूलन की घोषणा किये जाने और दलित उत्पीडन अधिनियम 1989 लागू होने के बावजूद आये दिन दलित उत्पीड़न से जुड़ी सैकड़ों घटनाएं होती रहती हैं, वैसा अब दक्षिण अफ्रीका में नहीं होता। जबकि गोरों के राज में वहां के मूलनिवासी कालों की हैसियत भारत के दलितों की भांति ही नर-पशु जैसी रही। पर, अब वह अतीत का विषय बन चुका है। अब वे आजादी का सुख भोग रहे हैं।


मूलनिवासी कालों को मिला सर्वव्यापी आरक्षण !


अनुचित भेदभाव रोकथाम अधिनियम 2000 की भांति रोजगार समानता अधिनियम 1998 एक ऐसा कठोर अधिनियम है, जिसमें कहा गया है, ‘रंगभेद के परिणामस्वरुप और अन्य भेदभाव कानूनों, व्यवहारों के कारण राष्ट्रीय श्रम बाजार में रोजगार– धंधे आय में असमानताएं हैं। ये असमानताएं कुछ निश्चित श्रेणीयों के लोगों के लिए ऐसी कठिनाइयां उत्पन्न करती हैं, जिन्हें मात्र भेदभाव पूर्ण कानूनों को समाप्त कर दूर नहीं किया जा सकता। इसलिए समानता के संवैधानिक अधिकार को बढ़ावा देने और वास्तविक प्रजातंत्र की स्थापना के लिए रोजगार के अनुचित भेदभाव को ख़त्म करना होगा, भेदभाव के प्रभावों को समाप्त करने के लिए रोजगार समानता सुनिश्चित करनी होगी और हमारे लोगों के प्रतिनिधित्व वाले विविध कार्यबल का निर्माण करना होगा, कार्यबल में क्षमता और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना होगा और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के सदस्य के रूप में गणतंत्र की अनिवार्यताओं को प्रभावशाली करना होगा।’


बहरहाल रंगभेदी शासन से मुक्ति पाने के मूलनिवासी काले शासकों ने अनुचित भेदभाव रोकथाम अधिनियम 2000 और रोजगार समानता अधिनियम 1998 जैसे अन्य कई प्रावधान किया, जिससे नस्लीय भेदभाव तो कुछ हद तक अतीत का विषय बना ही, इससे भी बढ़कर धनार्जन के समस्त स्रोतों सहित तमाम क्षेत्रों में ही विविध नस्लीय समूहों की संख्यानुपात में भागीदारी सुनिश्चित हो गयी। इससे जिन गोरों का तमाम क्षेत्रों में 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा रहा, वे अपने संख्यानुपात 9-10 प्रतिशत पर सिमटने लगे तथा उनका वर्चस्व टूटने लगा। वर्चस्व उनका कायम था तो भूमि पर। किन्तु अब मूलनिवासियों की तानाशाही सत्ता के जोर से 27 फरवरी 2018 को उनके हिस्से की कुल 72 प्रतिशत जमीन भी छीन कर मूलनिवासियों में बांटने का प्रावधान कर दिया गया है।


मुमकिन है: बहुजनो की तानाशाही सत्ता!

दक्षिण अफ्रीका में सदियों के दास मूलनिवासी कालों ने अगर अपने मालिक गोरों को देश छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया तो उसमें सबसे बड़ा योगदान उनकी तानाशाही सत्ता का रहा। अगर मूलनिवासी कालों का पशुवत इस्तेमाल हुआ तो वह काम गोरों ने अपनी तानाशाही सत्ता के जरिये अंजाम दिया। भारत में विगत छः सालों में मूलनिवासी एससी, एसटी, ओबीसी और इनसे धर्मान्तरित तबके अगर गुलामों की स्थिति में पहुंचे हैं, तो वह काम राष्ट्रवादियों की तानाशाही सत्ता के जोर से ही अंजाम दिया गया है। इस तानाशाही सत्ता के जोर से राष्ट्रवादियों ने मूलनिवासियों को बर्बादी के शेष कगार पर पहुंचा दिया है। दक्षिण अफ्रीका का अनुभव बताता है कि अगर भारत के मूलनिवासी भी बैलेट बॉक्स में क्रांति घटित करके अपनी तानाशाही सत्ता कायम कर लें तो वे इसके जोर से वंचितों को धनार्जन के समस्त स्रोतों सहित तमाम क्षेत्रों में हिस्सेदारी सुनिश्चित करवाने के साथ और अल्पजन सवर्णों को नियंत्रित भी कर सकते हैं। दक्षिण अफ्रीका की भांति भारत में जन्मजात वंचितों की तानाशाही सत्ता कायम होने पर यहां भी गोरों की तरह समस्त क्षेत्रों में सवर्णों को उनके संख्यानुपात पर सीमित किया जा सकता है। अगर 15 प्रतिशत सवर्णों को उनकी संख्यानुपात पर रोक दिया जाय तो उनके कब्जे के 15 प्रतिशत अवसरों को घटा कर प्रत्येक क्षेत्र में औसतन 70-75 प्रतिशत अतिरक्त (surplus) अवसर बहुजनों के मध्य वितरित करने का प्रावधान किया जा सकता है। अगर तानाशाही सत्ता कायम हो जाय तो दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासियों की भांति एससी, एसटी, ओबीसी का भी शक्ति के समस्त स्रोतों पर दबदबा कायम हो जायगा। वे शासित से दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासियों की भांति शासक में तब्दील हो जायेंगे। पर, सवाल पैदा होता है, जिस तरह वर्तमान में सवर्णों की तानाशाही सत्ता कायम है, उसे ध्वस्त कर क्या दक्षिण अफ्रीका की भांति वंचितों की तानाशाही सत्ता कायम की जा सकती है? क्या टुकड़ों-टुकड़ों में बंटे बहुजनों के वोट को सुविधाभोगी वर्ग के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है? स्थिति कठिन है, बावजूद इसके वर्तमान भारत में जो हालात हैं, उससे बहुजनों की तानाशाही सत्ता मुमकिन है।


लेखक एच एल दुसाध हिंदी साहित्यकार है तथा डायवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष है।

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