महाप्रजापति बनी बुद्ध धम्म में महिलाओं के संघ की नायिका

भीक्खुनी विजया मैत्रीय


सिद्धार्थ को जन्म देने के सात दिन बाद ही उनकी माता महामाया का देहांत हो गया था। मृत्यु से पहले महामाया ने बड़े ही विश्वास के साथ अपने नवजात शिशु को बहन महाप्रजापति के हातों में सौंपा था और कहा था कि तुम मुझसे भी अधिक प्यार से इस बच्चे को पालोगी ऐसा मेरा विश्वास है। महा-प्रजापति गौतमी ने उस विश्वास की लाज रखी। सिद्धार्थ को उन्होंने बड़े ही लाड़ प्यार से पालते हुए सर्वोत्तम संस्कारों से विभूषित किया।


"बहूनं वत अत्थाय माया जनयि गौतमं’’

उपर्युक्त शब्द महाप्रजापति गौतमी के हैं। वह कहती है - ‘‘अहो! बहुतों के लिए ही माया ने गौतम को जना।’’ इनसे अधिक उदात्त शब्दों में किसी छोटी बहन ने अपनी बड़ी बहन को श्रद्धान्जलि अर्पित नहीं की। इस देश में स्त्री-जाति का गौरव सामान्यतः ‘मातृग्राम’ (मातुगाम) अर्थात् ‘‘माताओं का समुदाय’’


ही प्रत्युक्त होता है। प्रजापति गौतमी अपनी बहन के मातृत्व के गौरव को स्मरण करती हुई कहती है - उसने गौतम-सा पुत्र जना, गौतम-जो अपने प्रयत्न से लोक में सम्यक् सम्बुद्ध हुआ, अन्धकारग्रस्त लोक के लिए जिसने ज्ञान का अक्षय दीपक जलाया, जिसका जीवन अपने लिये नहीं, बल्कि बहुतों के हित के लिए, सारी मनुष्य-जाति के हित के लिए उपयुक्त हुआ, उस गौतम को महामाया ने जन्म दिया। किसी माता के लिए इससे अधिक गौरव की और क्या बात हो सकती है?


‘बुद्ध’ के निर्माण में इस माता प्रजापति गौतमी का कितना हाथ था, यह हम उस कृतज्ञता और आदर से ही जान सकते हैं जो भगवान् बुद्ध ने इनके प्रति सदा अपने मन मे रखा था। बुद्ध के संघ में प्रवेश लेकर सम्पूर्ण स्त्री जाति के लिए ज्ञान का द्वार खोलने का श्रेय इसी माता प्रजापति गौतमी को जाता हैं।

वह भाद्रपद का ही महीना था। ९७ वर्ष की अवस्था में शुद्धोदन का देहांत हुआ। पति की मृत्यु के बाद प्रजापति गौतमी ने गृहस्थ जीवन को त्यागकर बुद्ध के संघ में प्रबज्जित होकर ज्ञान लेने की इच्छा जाहिर की। उनके साथ अन्य साक्य महिलाएं भी प्रबज्जित हौने के लिए उत्सुक थी। उस समय राजा शुद्धोदन के अंतिम संस्कार में शामिल होने के बाद बुद्ध और उनका भिक्खु संघ कपिलवस्तु में रुका था। इसे ही सुअवसर जान प्रजापति गौतमी ने बुद्ध के समक्ष अपनी इच्छा जाहिर की।

"मुझे भी भिक्खुनी के रूप में प्रवज्जा दे।"


"यदि आप महिलाओं को प्रवज्जा लेने की अनुमति दे तो बहुतों को लाभ होगा। हमारे वंश के बहुत से युवक भिक्खु बन गए है, उनकी पत्नियां अब भिक्खुनियों के रूप में सद्धम्म का पालन करना चाहती हैं। मैं भी भिक्खुनी बनना चाहती हूं। महाराज की मृत्यु के बाद मेरी एकमात्र यही इच्छा है। इससे मुझे बेहद प्रसन्नता होगी।"


बड़ी देर तक मौन रहने के बाद बुद्ध ने कहा, "यह संभव नहीं है।" तब रानी प्रजापति ने कहा, " मैं जानती हूं कि यह तुम्हारे लिये कठिन समस्या है। संघ में भिक्खुनियों को स्वीकार कर लेने से तुम्हें समाज का विरोध और प्रतिरोध सहना पड़ेगा। लेकिन मैं यह भी जानती हूं कि तुम इस प्रकार की प्रतिक्रियाओं से सरोज नहीं।"


बुद्ध थोड़ी देर चुप रहे और बोले, "राजगृह में बहुत-सी महिलायें प्रवज्जा लेने को तैयार हैं किंतु मैं समझता हूं कि इसका उपयुक्त समय नहीं आया है। संघ ने महिलाओं को स्वीकार करने की स्थितियाँ अभी अनुकूल नहीं हैं।"


इस प्रकार बुद्ध का उत्तर सुनकर माता प्रजापति महल लौट आई। किन्तु इस संवाद से महाप्रजापति बुद्ध के मन मे चल रहे द्वंद्व को जान गई थी की बुद्ध को महिलाओं के भिक्खुनी बनने से कोई एतराज नही किन्तु चिंता इस बात की है कि इसपर समाज और भिक्खु संघ की क्या प्रतिक्रिया होगी। क्या वे इन्हें इतनी सरलता से स्वीकार करेंगे? स्त्रियों को प्रवज्जित करने का अर्थ समाज व्यवस्था और उसकी पितृ सत्ता के साथ साथ पुरुष वर्चस्व को आव्हान देना था। इसी भेदभावपूर्ण मानसिकता और स्त्रियों के निम्न स्तर के कारण असामाजिक तत्वों से भी भिक्खुनोयों को खतरा हो सकता है इसका भी आभास बुद्ध को था।


महाप्रजापति गौतमी ने इस चिंतन के बाद, सभी इक्छुक महिलाओं को इकट्ठा कर बैठक ली और उसमे सभी की सहमति से एक ऐतिहासिक क्रांतिकारी निर्णय लिया गया। उन्होंने कहा, "सद्धम्म मार्ग में सभी सामान हैं। चेतना, जागृति और प्रज्ञा प्राप्ति की क्षमता सब मे होती हैं। बुद्ध ने अस्पृश्यों को भी भिक्खु की प्रवज्जा दे दी तब कोई कारण नही की वह महिलाओं को न स्वीकारे। महिलाएं पुरुषों से किसी भी रूप में कम नही है।"


आगे वह कहती है, "मेरा तो कहना है कि हम लोग सिर मुंडा ले, अपने श्रेष्ठ वस्त्र और आभूषण त्याग दें और भिक्खुओं का गौरीक चीवर धारण कर लें। हम नंगे पैरों ही वैशाली चलें, जहां हम प्रवज्जा के लिए अनुरोध करेंगे। (तब तक बुद्ध अपने संघ के साथ वैशाली चले गए थे।) इस प्रकार हम सिद्ध कर देंगे कि हम भी सादगी से रहने और सद्धम्म पालन में सक्षम हैं। हम भी सैकड़ों मील पैदल चलेंगे और भिक्षा मांगते हुए रास्ता तय कर लेंगे। संघ में प्रवेश पाने का यही एकमात्र उपाय बचा है।"


सभी महिलाएं प्रजापति गौतमी के विचारों से सहमत हो गई थी। महाप्रजापति गौतमी के रूप में उन्हें एक सच्चा नेता मिल गया था। यशोधरा भी जानती थी कि उसकी सास महारानी प्रजापति ऐसी महिला थी, जो किसी भी बाधा के आने पर भी मार्ग से हट नही सकती थी बल्कि वह बाधाओं को हटा देती थी। इसिलये यशोधरा महाप्रजापति के दृढ़ इच्छा शक्ति की महान प्रशंसक थी। निर्णय के अनुसार महाप्रजापति के साथ साथ सभी साक्य महिलाओं ने अपने ही हाथों सिर मुंडाया, काषाय वस्त्र धारण कर सभी आभूषणों का त्याग कर दिया। सभी 500 महिलाएं नंगे पैर महाप्रजापति के नेतृत्व में कपिल वस्तु से अपनी पैदल यात्रा वैशाली की ओर शुरू करती है। भूख,-प्यास, सर्दी-गर्मी, बारिश सब कुछ सहते हुए, फुले जख्मी पैरों, धूल से भरे, शरीर से थक्कर चूर, वैशाली में बुद्ध के निवास पर पहुंचे।


प्राचीन भारत के इतिहास में स्त्रियों के अस्तित्व को लेकर यह बहुत बड़ी ऐतिहासिक विजय थी। आगे और विजय का अगला कदम उनका इंतजार कर रहा था। महाप्रजापति गौतमी न केवल बुद्ध को बल्कि सारी दुनिया को दिखाना चाहती थी कि स्त्रियां कमजोर नही होती। न तन से न मन से। वह जो ठान लेती है, उसे पूरा करके ही रहती हैं। वह हर संकट का सामना कर सकती है। वह निर्भय है, वह स्वाभिमानी है। उसमें स्व निर्णय लेने की क्षमता और योग्यता है। महाप्रजापति ने प्रवज्जित होने की अनुमति नही मांगी, बल्कि वह स्वयम हो गई। अब तो केवल बुद्ध से मान्यता की अपील करनी थी।


आनंद ने माता प्रजापति और सभी स्त्रियों को बुरे हाल में देख कर उनसे पूछताछ की, और उनके इस तरह आने का कारण जाना। सब जानकर आनंद ने बुद्ध के पास उनकी अपील पहुँचाई।


आनंद ने बुद्ध से सीधे सवाल किया कि क्या स्त्रियां ज्ञान नही ले सकती? क्या वह निर्वाण को प्राप्त नही कर सकती? क्या वह अरहत नही हो सकती?


इन सबका जवाब बुद्ध ने दिया, "आनंद! स्त्रियां धम्म का साक्षात कर सकती है। वह निर्वाण को प्राप्त कर सकती है। स्त्री होने से कोई फर्क नही पड़ता।"

बुद्ध और आनंद का यह संवाद पूरी दुनिया मे स्वर्णाक्षरों से लिखा जाना चाहिए। इस संवाद ने बुद्ध के धम्म में समता का नया इतिहास लिखा। तुरंत बुद्ध ने वरिष्ठ भिक्खुओं की बैठक बुलाकर चर्चा की। भिक्खु सारिपुत्त ने आठ शर्तों को तय करते हुए भिक्खुनी संघ को मान्यता प्रदान की।


इस बैठक में बुद्ध द्वारा प्रतिपादित महत्वपूर्ण मत यह था कि, "मैं किसी भेदभाव के कारण महिलाओं से नही हिचकिचा रहा बल्कि मुझे भरोसा नही है कि महिलाओं को संघ में प्रवेश करने की अनुमति देने से संघ के भीतर और बाहर कुछ हानिकर संघर्ष नही हो" दूसरा महत्वपूर्ण विधान भिक्खु महामोगलायन का था, जिन्होंने इन आठ शर्तों को सुनने के बाद कहा, "ये आठ नियम तो सर्वथा भेदभावपूर्ण है। इस बात को आप अन्यथा कैसे सिद्ध कर सकेंगे?" सारिपुत्त का जवाब था, "ये आठ नियम तो भिक्खुनियों के लिये संघ के द्वार खोलने के लिए है। इन नियमो का उद्देश्य भेदभाव बनाये रखना नही, बल्कि भेदभाव समाप्त करना है।"


महाप्रजापति ने इन शर्तों को स्वीकार करते हुए भिक्खुनी संघ की स्थापना पर जैसे मोहर लगा दी। उसने सभी महिलाओं को भी समझाया, "ये आठ विशिष्ट नियम अस्थाई रूप से आवश्यक है, जिससे हानिकर विरोधों से संघ की रक्षा की जा सके। कुछ समय बाद भिक्खुनियो को प्रवज्जा देना एक निश्चित सत्य बन जायेगा तो इन नियमों की आवश्यकता नही रहेगी।'


इसके बाद भिक्खुनी संघ का बड़ी कुशलता जे साथ महाप्रजापति ने नेतृत्व किया। वह खुश वक्ता तथा संगठक थी। भिक्खुनियो ने अपने कार्य और योग्यता के बल पर साबित किया कि वह धम्म को उनके से उनके शिखर पर ले जाने में सक्षम है। बुद्ध प्रजापति का बड़ा आदर करते थे। प्रजापति भी संघ के समस्त लोगों का ध्यान रखती थी। महाप्रजापति गौतमी ने 120 वर्ष की अवस्था में परिनिर्वाण प्राप्त किया। वे बुद्ध और धम्म के प्रति अपने भावों को इस प्रकार अभिव्यक्त करती है-

हे बुद्ध! हे वीर! हे सर्वोत्तम प्राणी! तुम्हें नमस्कार!

जिसने मुझे और अन्य बहुत से प्राणियों को दुःख से उबारा। सब दुःखों के कारण का मुझे पता चल गया, उनके मूल कारण वासना का भी मूलोच्छेदन कर दिया गया। आज मैं दुःख-निरोग-गामी अरिय अष्टागिंक मार्ग में विचरण करती हूॅ। माता, पुत्र, पिता, भाई, मातामही मैं पूर्व जन्मों में अनेक बार बनती रही, यथार्थ ज्ञान को न जानती हुई मैं लगातार संसार में घूमती रही। मैंने उन भगवान् बुद्ध के दर्शन किए, यह मेरा अन्तिम शरीर है! मेरा अवागमन क्षीण हो गया, अब मुझे फिर जन्म लेना नहीं है! पुरूषार्थ में लीन, आत्म-संयमी, नित्य दृढ़ पराक्रम करने वाले, इन संघगत भिक्षुओं को अवलोकन करो - यह बुद्ध की वन्दना है।


इस क्रांतिकारी संघ नायिका को हमारा शत शत नमन जिसने स्त्री शिक्षा के अधिकार के ऐतिहासिक आंदोलन को सफल बनाया।

लेखिका भिक्खुनी विजया मैत्रीय हिंदी साहित्यकार है तथा विभिन्न विषयों पर उनकी किताबे प्रकाशित है।

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