रक्षा बंधन- ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का त्योहार

भिक्खुनी विजया मैत्रीय



आज के त्योहार रक्षाबंधन के सूत्र हमारे पूर्वज असुरराज बली के इतिहास में मिलते है, जहां से इस देश में सांस्कृतिक प्रतिक्रान्ति की शुरुवात होती है।


राजा बलि को बंधक बनाया


'येन बद्धो राजाबली दानवेंद्रो महाबलं,

तेन त्वामी प्रतिबद्धामी रक्षे माचल माचल।'


इस मंत्र का अर्थ है, ' राजा बली जैसे दानी शूर वीर को बांधा था वैसे ही तुम्हे बांधता हूं। तुम मेरी रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हो, हलचल न करना।'


इस मंत्र में स्पष्ट रूप से राजा बलि का जिक्र आ रहा है। इसी से ज्ञात होता है कि, इस मंत्र का संबंध इस देश के ऐतिहासिक असुर राजा बली से है (जिनका काल बुद्ध से एक हजार वर्ष पहले का माना जाता है)। उसी तरह यह मंत्र ही बता रहा है की राजा बली को बांधा गया था। उसे बंधक बनाकर अपनी (वामन की) रक्षा के लिए वचन बद्ध करके किसी भी प्रकार का विरोध न करने के लिए कहा गया था। इस बात के साक्ष्य हमे ब्राह्मणी साहित्य के विष्णु पुराण और भागवत पुराण में मिलते है। जो इस प्रकार है।


असुरों का राजा बली एक आदर्श प्रशासक था। वह बड़ा दानी था। गरीबों को, साधु संतों को दान करना, उनकी सहायता करना वह अपना धर्म समझता था। उसका शासन सम्पूर्ण भारत वर्ष पर था। उसकी कीर्ति दूर दूर तक फैली हुई थी। किन्तु देवों को (देव - एक मनुष्य जाति) उसकी सत्ता मंजूर नही थी। वे उसे उसकी सत्ता से हटाकर अपनी सत्ता कायम करना चाहते थे। किंतु अनेक बार हुए देवासुर युद्ध मे देवों को असुरों से मुंह की खानी पड़ी। वे जान गए थे कि महा शक्तिशाली बलशाली राजा बली को युद्ध के मैदान में हराना असंभव है । तब उन्होंने विष्णु (विष्णु - एक प्रशासकीय पद, जो देवों में से था ) से सहायता मांगी। विष्णु ने ब्राह्मण का भेस बनाकर राजा बलि जहाँ सभी को दान दे रहे थे वह जाकर दान मांगा। दान में उसने दो चरणों मे ही सम्पूर्ण राज्य ले लिया। तीसरा चरन बाकी था, किंतु राजा बलि के पास उसे देने के लिए कुछ नही बचा था। तब राजा बली ने अपना वचन पूरा न कर पाने के कारण स्वयम को विष्णु के हवाले कर दिया। उसका आधिपत्य स्वीकार कर उसका गुलाम हो गया।


'राजा बली के अनुचरों और विष्णु के पार्शदों के संघर्श के बाद विष्णु चुप नहीं बैठा। जिस दिन अश्वमेघ यज्ञ में सोमपान होनेवाला था उसी दिन विष्णु की ईच्छा से पक्षिराज गरूड ने राजा बली को कैद कर लिया।' इस तरह का वर्णन भागवत पुराण में दिया है। ‘विष्णु देव के ह्दय की बात जानकर पक्षिराज गरूड ने वरूण के पाशों से बली को बाॅंध दिया।

आज से ३५०० वर्ष पूर्व राजा बलि को बंधक या गुलाम बनाया गया था किन्तु आज भी लगातार इस पुरानी बात को दोहराया जा रहा है। इसका क्या औचित्य है? इसे हमें जानना चाहिए।


रक्षा सूत्र और कलावा



उपर्युक्त मंत्र से यह भी सिद्ध होता है कि आज के शूद्र बहुजन प्राचीन कल के असुर राज बली के वंशज है। तब से अबतक, शूद्र बहुजन ब्राह्मणों को दिया हुआ वचन निभाते आरहे है, उनकी गुलामी करते आ रहे है। जैसे कोई बंधुआ मजदूरी करता है।


ब्राह्मण पुरोहित द्वारा शूद्र हिन्दुओं की कलाई पर मदार की रूई से या रेशम से बने रंग बिरंगे धागों से बना रक्षा सूत्र या कलावा कहकर धागा बांधा जाता है। ऐसा क्यों? इसका क्या अर्थ है? और यह धागा, बहुजानो के अलावा क्या ब्राह्मण स्वयं के हाथ में भी बांधता है? यदि रक्षा करने की ताकत धागे में होती तो ब्राह्मण भी अपने हाथ में बांधते। किन्तु ऐसा नहीं है। दरअसल धागा किसी की रक्षा करता है ये भ्रम फैलाया गया है। वास्तव में इसका अर्थ है, जिसके हाथ में यह धागा बांधा जाता है, वह वचन बद्ध होता है कि वह बांधने वाले की रक्षा करेगा। अर्थात शुद्र की कलाई में ब्राह्मण द्वारा धागा बांधना मतलब शुद्र ब्राह्मण की रक्षा करेगा, ना कि धागा शुद्र की। शूद्र ब्राह्मण का बंधक हो जाता है, और वह ब्राह्मण की रक्षा करने के लिए और उसकी सेवा करने के लिए प्रतिबद्ध होता है। यही इस सूत्र का अर्थ है, जिसे रक्षा बंधन कहा जाता है।


यदि ऐसा नहीं होता तो राजा बलि का मंत्र बोलने की आवश्यकता ही नहीं होती। किन्तु इसे विपरित अर्थ में प्रचारित करने के कारण यह शब्द सभी को लुभावना लगने लगा। इससे क्षत्रिय और वैश्य भी अलिप्त ना रह सके। क्योंकि ब्राह्मण इन सभी निम्न वर्णों के यहां पुरोहिताई करते है जिससे उन्हें दान मिलता है। बनियों के दुकानों पर भी यह रंगीन धागा तुला में भी बांधा जाता है। हर चीज की, रक्षा के नाम पर, जगह जगह पेड़-पौधों, दरवाजों आदि में धागे बांधने कि परंपरा का अब चलन बढ़ गया है।


पहले यह सिर्फ, श्रावणी पूर्णिमा के मौके पर होता था, क्युकी राजा बलि को उसी समय बंधक बनाया गया था। किन्तु कालांतर में इस तरह की पूजा अनेक मौकों पर की जाने लगी, क्योंकि इससे ब्राह्मण पुरोहित को बड़ी मात्रा में दान दक्षिणा मिलती थी और आज भी मिलती है, जिससे उसका उदार निर्वाह होता है। एक प्रकार से शुद्र बहुजन सच मे उसकी रक्षा ही करते है। किंतु वे इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ है। इसके विपरीत वे इस भ्रांति में जीते है कि ब्राह्मण पुरोहित ने हमारे लिए पूजा कर हमें रक्षा सूत्र बांधकर बहुत बड़ा उपकार किया है। अब हमारा कुछ नही बिगड़ेगा। हम अब सुरसक्षित है। सारी विपदाएं खत्म हो जाएगी। सारी विपदा खत्म करने के बदले पुरोहित को दान दक्षिणा दिया तो क्या हुआ? इसका उन्हें कोई अफसोस नही होता। पुरोहित का तो दान पर घर परिवार चलता है किंतु शूद्रों का उस धागे से कितना भला हुआ, कैसे रक्षा हुई इसे शुद्र कभी नही जांचता। यदि कुछ अच्छा नही हो रहा है तो ब्राह्मण पुरोहित को और एक पूजा का निमित्त मिल जाता है जिससे उस बेचारे यजमान को दान के नाम पर और लुटने का मौका मिल जाता है। यह सिलसिला कभी थमता नही क्योंकि ये सब करने से शुद्र कभी सुखी होता नही। उसकी समस्याएं जस की तस बनी रहती है।


भाई बहन का रक्षा बंधन



राखी का त्योहार और भाईदूज भी लक्ष्मी द्वारा महाबली को राखी बांधने से जोडा गया है। जो इस प्रकार है;


कहते है, जब वामन ने राजा बलि को सुतल में भेज दिया था तब वामन ने राजा बली को वरदान दिया था कि सुतल में वह राजा बली का पहरेदार बनकर रहेगा। अतः उसे भी सुतल में जाना पड़ा। तब विष्णु की पत्नी लक्ष्मी, विष्णु के बिना परेशान हो रही थी। तब एक दिन लक्ष्मी ने एक गरीब औरत का भेस बनाकर राजा बली से भाई बनने का आग्रह किया। जिसे बली ने स्वीेकार कर लिया। लक्ष्मी ने भाई बली को तिलक लगाकर पूजा की और लक्ष्मी ने बली से विष्णु को आजाद करने का वरदान मांगा। दूसरी कथा भी इससे मिलती जुलती है।


राजा बलि ने विष्णु से पाताल लोक को अपने राज्य के रूप में प्राप्त किया था। विष्णु देव ने प्रसन्न होकर राजा बली से वर मांगने के लिये कहा। वामन ने राज्य का रक्षक बनने की स्वीकृति प्राप्त की। वैकुंठ त्याग कर पाताल लोक में विष्णु के नौकरी किये जाने से लक्ष्मी बेहद नाराज हुई। कुछ समय पश्चात लक्ष्मी ने राजा बली के यहाॅ पहुॅंच कर उनका विश्वास प्राप्त किया। तत्पश्चात राजा बली को रक्षा सूत्र बांधकर लक्ष्मी ने बहन का पद प्राप्त किया। राजा बली से भाई का संबंध स्थापित होने पर विष्णु की सेवानिवृत्ती तथा स्वतंत्रता को वापस लिया।


इन कथाओं को किंवदंतियां भी कहते है। इनके पुराणों में भी प्रमाण या संदर्भ नहीं मिलते। इसलिए हम कह सकते है कि यह कहानियां बहुत बाद में बनाई गई होगी। इसके बावजूद हम इन कथाओं की भी चिकित्सा कर यह कैसी झूठी है यह सिद्ध कर सकते हैं।


इस कथा में काफी विरोधाभास दिखाई देता है। विष्णु जब जीत गया और राजा बली को बंधक बनाया तो एक जीता हुआ हारे हुये के यहाॅं पहरेदार की नौकरी क्यों करेगा? हाॅ! यह हो सकता है कि बंधक कोई चालाकी ना करें, दुबारा विद्रोह ना करे इसके लिये उस पर नजर रखने के लिये पहरेदारी की जा सकती है। उसी प्रकार दूसरा विरोधाभास यह भी दिख रहा है कि एक कथा में कहा गया कि लक्ष्मी और सारे देव बली के कारागार में कैद थे उन्हें विष्णु ने छुड़ाया, वहीं दूसरी कथा में कह रहे है कि विष्णु बली के कारागार में नौकर हो गया था, जिसे लक्ष्मी ने बाहर से आकर चतुराई से छुड़ाया।


खैर, यह किंवदंतियाॅं है, इन्हीं सूत्रों को पकड़कर हम सच तक पहुॅंचने की कोशिश करते है। लगता है, पुरोहिताई करते हुए धागा बांधने के पिछे कोई न कोई कारण तो बताना था इसलिए बलि को बंधक बनाने की असली घटना को छुपाने के लिए और विष्णु को महान साबित करने के लिए ऐसी कहानियां सुनाई गई। इससे लोगो के मन में विष्णु के प्रति श्रद्धाभाव बढ़ा, साथ ही बहन भाई के आपसी रिश्ते के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी। इस पार्शवभूमी के आधार पर यह परम्परा फलने फूलने लगी।


पूर्व में यह काम ब्राह्मण पुरोहित ही पूजा के दौरान करते थे। इस सदियों की गुलामी को आज बड़े लुभावने अंदाज़ में रक्षा बंधन पर्व के नाम से मनाया जाता है। कालांतर में इसे रक्षा बंधन त्योहार के रूप में अधिक मान्यता मिली। ब्राह्मण, धर्म के नाम पर किसी भी नई परंपरा को जन्म देने का हुनर रखता है। तो इसे भी बहन भाई का त्योहार कह दिया। किन्तु यह नही कहा कि भाई के हाथ पर जो धागा बांधा जाता है वह धागा भाई की रक्षा करेगा। बल्कि कहा जाता है कि भाई को, धागा बाँधनेवाली बहन की रक्षा करनी पड़ेगी।


रक्षाबंधन पुरुषसत्ता को बढ़ावा


हालाकि भाई भी जानते है कि बहन की रक्षा करनी है, या अपने छोटे भाई की भी रक्षा करनी, या पूरे परिवार की भी रक्षा करनी है, प्रश्न ये उठता है कि अपने परिवार का खयाल रखना और उसकी रक्षा करना तो एक कर्तव्य है, लेकिन क्या ये कर्तव्य केवल पुरुष का है? या क्या केवल पुरुष ही अपने परिवार की रक्षा करते है? देखा गया है कि परिवार की "रक्षा" करने की अगर बात हो, तो वो मां होती है जो अपने बच्चो की रक्षा के लिए हर तरह कि चुनौतियों का सामना करती है, ये बात केवल इंसान ही नहीं बल्कि प्राणियों में भी देखी जाती है। औरत, मां बनने से पहले ही मातृत्व भाव से भरी होती है तो अपने छोटे भाई बहनों के लिए मां समान ही होती है, और उनकी रक्षा करती ही है। तो अगर बड़ी बहन हो वो अपने छोटे भाई की रक्षा करेगी या उसकी कलाई पर कोई धागा (राखी) बांधकर उससे अपनी रक्षा करवाएगी?

तो यह सिद्ध होता है कि इस प्रथा में जबरदस्ती पुरुषों को बड़ा और जिम्मेदार बताया जाता है, और महिलाओं को खुदकी ही रक्षा के लिए पुरुषों पर निर्भर बताया जाता है। वैसे उसकी रक्षा भी 'पुरुषों से ही' करनी होती है, ये बात भी उतनी ही सच है। इस तरह रक्षा बंधन जैसे पर्वो के द्वारा पुरूषसत्ता को मजबूत बनाया जाता है।


खैर, भाई हो या बहन, हिन्दू हो या मुसलमान सभी इसे बस त्योहार और परम्परा की तरह इसे मानते है। बहन छोटी हो या बड़ी, अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है, भाई भी उसे कुछ तोहफे देकर खुश करते हैं।

किन्तु जिस दिन वाकई में लाचार बहन को घर मे पनाह देने या उसे संपत्ति में हिस्सा देने की बात आती है तो वह मुंह फेर लेते है। वह दो पैसे का धागा बंधवाना भी पसंद नही करते। जब तक वो हिस्सा नही मांगती तब तक प्यारी बहन होती है। राजा बलि बनना सभी के बस की बात नहीं।


जिन भाई बहनों का आपस मे प्यार होता है वे इन धागों के मोहताज नही होते। वे दोनों ही एक दूसरे के सुख दुख में सहभागी होते है।



भिक्खुनी विजया मैत्रीय यह हिंदी साहित्यकार है।



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