रमाई- 'माँ' जिसने इतिहास रचा

By भिक्खुनी विजया मैत्रीय l Bhikkhuni Vijaya Maitriya

Picture source: by Sonali Meshram


भारत की महानतम नारियों का इतिहास 'माँ' जिसने इतिहास रचा इस लेख श्रृंखला के तहत प्रस्तुत है माता रमाई की जीवनी...


रामजी बाबा की 'रामी' से मुलाखत

जब भीमराव मुम्बई के एलफिन्सटन स्कूल में दसवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। तब पिता रामजी को लगातार उनकी पढ़ाई की ही चिंता सताती थी। वे अपने भिवा के लिए कहीं न कही से जरूरत की किताबें जैसे तैसे खोज कर लाते थे। किंतु घर के अन्य सदस्य भिवा की बढ़ती उम्र को देखकर उसके विवाह की चिंता कर रहे थे। वे रामजी पर लगातार दबाव बना रहे थे कि कोई अच्छी सी लड़की भिवा के लिए देखकर शादी पक्की की जाय। रामजी भी भिवा का विवाह करना चाहते थे। किंतु उनकी चिंता यह थी कि उनके भिवा के लिए कोई ऐसी लड़की मीले जो उसकी पढ़ाई लिखाई के महत्व को समझ सके, उसकी पढ़ाई में रुकावट न बने और वह इतनी समंजस भी हो कि घर की गरीबी और अभावों का भी मुकाबला कर पूरे घर को साथ लेकर चल सके।

इस सिलसिले में रामजी का भिवा के लिए लड़कियां देखना भी जारी था। लोग लड़की दिखाते थे और रामजी बाबा लड़की के लिए मना नही कर पाते थे। किंतु जब उन्हें उससे बेहतर लड़की दिखती तो वे पहली लड़की को मना कर देते थे। ऐसा एक नही दो बार हुआ। इस कारण से न केवल घर के लोग नाराज होते थे बल्कि रामजी बाबा को भी अपने इस व्यवहार पर बड़ी ग्लानि होती थी। किन्तु अपने भिवा के भविष्य के लिए वे इसे भी झेलने के लिए तैयार थे। आखिर में उनकी खोज जाकर खत्म हुई भायखला के वनंदगकर के घर में।

रामजी बाबा एक मित्र के साथ किसी काम से वलंगकर के घर पंहुचे तो उनकी नजर एक 8-9 वर्ष की बालिका पर जाकर रुक गई। वह बालिका अपने रोते हुए छोटे भाई के आंसू पोंछते हुए बड़े प्यार से उसे समझा रही थी कि बाहर के लड़ाई झगड़े से रोते नही बल्कि जाकर उसे निपटाते है। वह बिल्कुल एक छोटी सी समझदार 'माँ' ही लग रही थी। रामजी बाबा उस बच्ची को बड़े प्यार से निहारते रहे। फिर उससे बातचीत की तो उन्हें यकीन हो गया कि यह बच्ची बहुत ही समझदार और कुशाग्र बुद्धि की है और उनके मन मे फिर विचारों का चक्र शुरू हो गया कि यही लड़की मेरे भिवा के लिए सही रहेगी। इसके लिए उन्हें पहले पसंद की हुई लड़की वालों से बातचीत तोड़नी पड़ी।


अब रामजी बाबा ने विवाह की बातचीत शुरू की। रामी वनंदकर की भतीजी थी। उसका नाम रमाबाई था। प्यार से सब उसे 'रामी 'कहते थे। रामी का जन्म 7 फरवरी 1898 में महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के दापोली तालुका, वनंदगांव में हुआ था । उसके पिता भीकू धोत्रे तथा माँ का नाम रुक्मिणी था। वे गांव के महारपुर बस्ती में रहते थे। पिता भीकू धोत्रे मछली मार्केट में पेटियां उठाने का काम करते थे। जिससे वे हमेशा बीमार रहने लगे थे। रामी के बचपन मे ही पिता और माता दोनों का देहांत हो गया था। उनके पीछे रामी के साथ उसकी 2 छोटी बहन और एक छोटा भाई भी था। जब वे अनाथ हो गए तो उनके चाचा वनंदकर और गोविंदपुरकर मामा बच्चों को मुम्बई के भायखला में ले आये। वे वहां एक चाल में रहते थे। इसी चाल में रामजी बाबा की मुलाखत रमाबाई से हुई और वे उससे प्रभावित हो गए।


रमाबाई का विवाह

घरवालों ने चैन की सांस ली थी कि आखिकार रामजी बाबा ने लड़की को पसंद कर लिया। सभी विवाह को लेकर बड़े उत्साहीत थे। किंतु रामजी बाबा भिवा के मैट्रिक की परीक्षा का परिणाम देखने के लिए आतुर थे। उसके बिना वे विवाह के बारे में सोच ही नही पा रहे थे। आखिर वो भी दिन आ ही गया। भिवा के मैट्रिक का परिणाम आया। भिवा पास हो गया था और रामजी बाबा के खुशी का ठिकाना न था। इसके बाद ही रामजी बाबा ने विवाह में दिलचस्पी ली। 1908 में भायखला के खाली मच्छी मार्केट में भोर को बारिश में ही रमाबाई और भीमराव का विवाह संपन्न हुआ। विवाह के बाद छोटी सी रमाबाई रामजी के परिवार में रहने लगी। जिसमें भिवा की दूसरी मां, बुआ मीराबाई, बड़ा भाई आनंद और उसकी पत्नी लक्ष्मी साथ में रहते थे। भरापूरा परिवार था। जिसमें रमा को अपने मातापिता की कमी पूरी होती महसूस हुई। वह इस घर संसार मे रमने लगी। भिवा उसे प्यार से 'रामु 'बुलाते थे तो रामु उन्हें साहेब कहकर बुलाती थी। रामु ने कुछ ही दिन में जान लिया था कि घर की आर्थिक परिस्थिती ठीक नही है, इस पर साहेब की पढ़ने की महत्वकांक्षा भी है, पर वह इसमें तालमेल बिठाने लगी।


रमाई का जीवन संघर्ष

उनका वास्तविक जीवन संघर्ष तब शुरू हुआ जब बाबासाहेब का लंदन पढ़ाई के लिए जाना हुआ। बड़ौदा के माहाराज सयाजी राव गायकवाड़ ने उन्हें स्कॉलरशिप देकर लंडन पढ़ने भेजा था। तब बाबासाहेब घर खर्च के लिए कुछ थोड़े ही पैसे देकर गए थे। जो जल्दी ही खत्म हो गए। घर चलाने के लिए वह आर्थिक तंगी से जूझने लगी थी। गृहस्थी का सारा भार रमाई पर आ गया था। इस विपन्नता में वह घर चलाने के लिए कभी कभी उपले चुनकर उन्हें बेचकर कुछ कमा लेती तो कभी मजदूरी कर लेती थी। कभी 50-60 पैसे कमाती तो उन्हें बड़ी ही कटौती से खर्च करती थी। कई बार आधा पेट खाकर भी गुजारा करना पड़ता था। रमाई के साथ उसकी छोटी बहन और भाई शंकर भी रहते थे। वे भी मोलमज़दूरी कर घर चलाने में मदत करते थे। कुछ ऐसे ही हालात बाबासाहेब के भी थे लंदन में।

लंदन से 25 नवंबर 1921 को बाबासाहेब द्वारा रमाई को लिखे पत्र से हमे उनके बुरे हालातों का अंदाज होता है। बाबासाहेब रमाई के पत्र का जवाब लिखते है कि ''गंगाधर(पहला पुत्र) बीमार है, यह जानकर बहुत दुख हुआ। स्वयम पर विश्वास रखों। चिंता करने से कुछ नही होगा। तुम्हारी पढ़ाई चल रही है यह जानकर प्रसन्नता हुई। मैं पैसों की व्यवस्था कर रहा हूँ, मैं भी यहां अन्न को मोहताज हूँ। तुम्हें भेजने के लिए मेरे पास कुछ नही है। फिर भी कुछ प्रबंध कर रहा हूं। वे सलाह देते है कि जरूरत पड़ने पर जेवर बेचकर घर चलाना ( यह जेवर बाबासाहेब की मां भिमाई का स्त्रीधन था) मैं तुम्हे फिर नए बनवा दूंगा।"

इस पत्र के मजकूर से यह ज्ञात होता है कि ऐसे बुरे हालातों में भी रमाई अक्षरज्ञान लेने की कोशिश कर रही थी ताकि वह अपने विदेश में पढ़ रहे जीवनसाथी से पत्रव्यवहार कर सके। दूसरी बात, रमाई अपने आर्थिक हालात बता रही है किंतु बाबासाहेब भी उन्हीं हालातों से गुजर रहे थे और पैसे भेजने में असमर्थ थे इसलिए वे रमाई को जेवर बेचकर काम चलाने की सलाह देते है।

बाबासाहेब का पत्र पढ़कर रमाई को और भी दुख हुआ। और इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी स्त्री ने विदेश में पढ़ रहे अपने जीवनसाथी को आर्थिक मदत भेजी।

30 दिसंबर 1930 के लंदन में लिखे उत्तर में बाबासाहेब कहते है, "यह ताकद जो मुझे मिली है, उसमे तुम्हारा भी हिस्सा है। तुम मेरा संसार संभाले बैठी हो। आंसुओं का जल छिड़ककर मेरा मनोबल बढ़ा रही हो, इसलिए मैं निश्चित होकर ज्ञान के अथाह सागर को ग्रहण कर पा रहा हूं।"

उसी प्रकार बहिष्कृत भारत के संपादकीय में लिखी बाबासाहेब की यह अभिव्यक्ति भी हमें रमाई के संघर्ष की दास्तान सुनाती है। वे लिखते है, 'कौड़ी का फायदा न होते हुए जिसने (बाबासाहेब ने) एक वर्ष तक बहिष्कृत भारत के 24-24 कॉलम लिखकर जनजागृति का काम किया तथा जिसे करते समय जिसने अपने स्वास्थ्य, सुख, चैन, आराम की परवाह न करते हुए, अपने आंखों की बाती बनाया। इतना ही नहीं इस लेखक के विदेश में रहते समय जिसने(रमाई) रात-दिन अपनी गृहस्थी का भार संभाला तथा आज भी वह संभाल रही हैं। यह लेखक परदेस से वापस आने पर अपनी विपन्नावस्था में अपने सिर पर गोबर के टोकरे ढोने के लिए भी आगे पीछे नही देखा, ऐसी अत्यंत ममतामयी, सुशील तथा पूज्य पत्नी के संपर्क में जिसे चौबीस घंटे में से आधा घंटा भी साथ बिताने को न मिला।'

बाबासाहेब जब देश मे होते तो भी उनका सारा समय समाज के बारे में सोचने, पढ़ने-लिखने में जाता था। कभी कभी रमाई इस बारे में परेशान होकर शिकायत भी करती थी। बासाहेब को अपने खाने पीने का भी होश नही रहता था। अक्सर रमाई उनके खाने को लेकर चिंता करती थी, कभी कभी जहां मीटिंग होती वहीं भोजन का डिब्बा लेकर पहुँच जाती थी। किन्तु इन सब परिस्थितयों में वह स्वयम का ध्यान नही रख पा रही थी।


बच्चों का खोना

अभावों के चलते पहले उन्होंने पुत्र गंगाधर को खो दिया था। उसके बाद एक एक करके और तीन बच्चों की मृत्यु को भी उन्हें सहना पड़ा। चौथे पुत्र राजरत्न की मृत्यु ने तो दोनों को पूरी तरह तोड़कर रख दिया था। अब उनका एक ही बेटा यशवंत बचा था।

बाबासाहेब के मित्र दत्तोबा पवार को लिखे पत्र में उनका दर्द इस तरह छलक पड़ा, वे लिखते है, "पुत्र निधन से हम दोनों को जो आघात पहुंचा है, उसे अतिशीघ्र भूल पाना संभव नहीं। अभी तक तीन पुत्र और एक पुत्री को श्मशान पहुंचाने का काम इन हाथों ने किया है। जब भी ये यादें सताती है, मन दुख से विचलित हो उठता है। बच्चों के निधन से हमारा जीवन निःस्वाद हो गया है, जैसे बिना नमक का भोजन।"


रामु से बनी रमाई

उपरोक्त सभी बातों का अर्थ कोई यह लगा सकता है कि रमाई ने अपने पति के लिए या अपने बच्चों के लिए संघर्ष किया इसमें विशेष क्या? बहुत से लोग इस बात से अनभिज्ञ है कि अपने 'साहेब' की 'रामु' कब कैसे नौ करोड़ जनता की 'रमाई' हो गई। विपरीत परिस्थितियों से जूझती रामु अच्छी तरह जानती थी कि उसके साहेब कोई साधारण व्यक्ति नहीं। वे सम्पूर्ण समाज के उद्धारक है। अपनी चार सन्तानो की आहुति देने के बाद भी वह उन करोड़ों वंचित संतानों के हक की लड़ाई में बाबासाहेब के साथ खड़ी थी। उनकी सामाजिक आंदोलनों में उनकी सहभागिता समय समय पर देखने को मिलती थी। उन्होंने कई सामाजिक आंदोलनों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। दिन पर दिन उनकी रुचि बढ़ती जा रही थी।

1920 की मानगांव परिषद में उनकी जिज्ञासा थी, शाहूं माहाराज के कार्यों के बारे में वह कई सवाल उपस्थित करती थी। उन्होंने 1927 के महाड़ संग्राम में भाग लेने की उत्सुकता दिखाई। उनकी सामाजिक आंदोलनों के प्रति रुचि को मुम्बई के जे जे अस्पताल में स्त्रियों की सभा को संबोधित किये भाषण से मापा जा सकता है।

रमाई की बढ़ती रुचि को देखते हुए बाबासाहेब ने उन्हें स्त्रियों का नेतृत्व करने का सुझाव दिया था। किंतु रमाई ने केवल भोजन की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी को स्वीकार किया था। यदि रमाई चाहती तो बाबासाहेब के कंधे से कंधा मिलाकर स्त्रियों का नेतृत्व कर सकती थी। किंतु उन्होंने ऐसा चाहा ही नहीं।

उनकी ममता और करुणा केवल अपने बच्चों के लिए नही बल्कि सभी के लिए थी यह बात एक मार्मिक प्रसंग से सिद्ध होता है। उस समय बाबासाहेब भारत मे नहीं थे। बाबासाहेब ने गांव के बच्चों के लिए कुछ होस्टल्स खोले थे। पैसों के अभाव में वे होस्टल्स भी जैसे तैसे चल रहे थे। उस समय बाबासाहेब ने रमाई को धारवाड में हवा परिवर्तन के लिए छोड़ा था। उसके बगल में ही एक हॉस्टल था। उस हॉस्टल के बच्चे, जहां रमाई रुकी थी उस आंगन में खेलने आते थे और शोर मचाते थे, किन्तु अचानक दो दिन से बच्चे खेलने नहीं आए तो उन्हें चिंता सताने लगी तब रमाई ने वराडे काका से पूछा जो हॉस्टल की देख रेख करते थे, "दो दिन से इतनी शांति क्यों है? बच्चे खेलने क्यों नही आ रहे?" तब वराडे काका ने उन्हें बताया कि, "दो दिन से बच्चो ने खाना नहीं खाया, बच्चो के भोजन के लिए जो अनुदान आता था, वो नहीं आया है, अभी और दो दिन भोजन नहीं बन पाएगा।" ये जानकर रमाई को बहुत दुख हुआ, उन्होंने वराडे काका को फटकारा की " ये बात अपने मुझे पहले क्यों नहीं बताई?"

उन्होंने तभी के तभी अपने हाथ से सोनें की चूड़ी निकालकर उन्हें देते हुए कहा, "अभी के अभी इसे बेचकर बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था की जाय।" तभी से बच्चे उन्हें ' रमाई ' कहकर पुकारने लगे।

उनकी ममता और करुणा का अनुभव सभी को होता था और लोग उन्हें आईसाहेब कहकर पुकारते थे। वह सबकी रमाई हो गई।


बाबासाहेब को रामु की चिंता थी

आज के लोग बाबासाहेब पर यह तोहमत लगाते है कि उन्होंने रमाई का, अपने बच्चों का ध्यान नही रखा।

तोहमत लगानेवालों को मेरा यह जवाब है, जो अपने घर परिवार के अलावा किसी दूसरे के प्रति संवेदनशील नही होते, जिन्हें समाज और मानवता से कोई लेना देना नही होता, केवल अपना ही भला देखते है उन्हें स्वार्थी कहा जाता है; और जो अपना सारा जीवन मानव समाज के हित मे अर्पण करते है जिसमे वे अपने परिवार का क्या, खुद का भी ख्याल नही कर पाते उन्हें माहामानव कहते है, 'युगप्रवर्तक' कहते है।

बाबासाहेब समाज के लिए संघर्ष कर रहे थे किंतु रमाई की ओर से बेफिक्र भी नही थे। वे उन्हें बार बार अपना ध्यान रखने के लिए कहते। समय पर खाने के लिए कहते थे। वे उसे खोना नही चाहते थे। जब रमाई बहुत बीमार थी तब हवा परिवर्तन के लिए वे उसे धारवाड़ ले गए थे। फिर भी उनके स्वास्थ्य में सुधार नही हो रहा था। सुधार के लिए बाबासाहेब ने काफी प्रयास किये। डॉक्टर से इलाज भी करवाये किन्तु कोई असर नही हुआ था। शायद उनकी रोगप्रतिकार शक्ति ही समाप्त हो चूकी थी।

रमाई के अंतिम समय में बाबासाहेब उन्हें लेकर हमेशा चिंतित रहते थे। किंतु वे उसे बचा नही पाए।

27 मई 1935 को रमाई ने बाबासाहेब का हाथ अपने आठों में लेकर कहा था, "आप मुझे वचन दो कि मेरे देहांत के बाद आप हताश नहीं होंगे, हमारे बच्चे तो जिंदा नहीं रह सके, समाज ही अपने बच्चे है, मुझे वचन दो कि आप उन्हें ब्राह्मणी व्यवस्था से आजाद करेंगे।" ऐसा कहकर रमाई ने अपने प्राण त्याग दिए।

बाबासाहेब की रामु जो नौ करोड़ जनता की रमाई थी वह अपने बच्चों को छोड़कर आज जा चुकी थी। उनकी मृत्यु के बाद कई दिनों तक बाबासाहेब अपने कमरे में छोटे बच्चे की तरह फुट फुट कर रोते रहे।

एक ऐतिहासिक हस्ती को आकार देने का ऐतिहासिक कार्य इस मां ने किया था। यह उसकी उत्कृष्ट रचना थी।


बाबासाहेब की अपनी रामु को श्रद्धांजलि

1935 में रमाई के देहांत के 6 वर्ष बाद 1941में बाबासाहेब आम्बेडकर द्वारा लिखित पुस्तक 'दी पार्टिशन ऑफ इंडिया को बासाहेब ने रमाई को समर्पित किया।

उनके शब्द इस प्रकार है- रामू की याद को समर्पित, उसके सुंदर हृदय, उदात्त चेतना, शुद्ध चरित्र व असीम धैर्य और मेरे साथ कष्ट भोगने की उस तत्परता के लिये, जो उसने उस दौर में प्रदर्शित की जब हम मित्र विहीन थे और चिंताओं तथा वंचनाओं के बीच जीने को मजबूर थे, इस सबके लिये मेरे आभार के प्रतीक रूप में।'



Bhikkhuni Vijaya Maitriya is a Bhuddhist nun, a social activist and an author with her 5 books published in Hindi language, she also writes regularly on her blog called Dhamma sisters https://dhammasisters.wordpress.com/author/dhammasisters/


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