रामजी सकपाल- हमारे पिता के पिता

-भिक्खुनी विजया मैत्रीय






आज हम डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर को जिस रूप में देखते है, दरअसल वह आइना है उनके पिता 'रामजी' का, जिसमें हबेहुब रामजी का ही व्यक्तित्व नजर आता है। बाबासाहेब की सोच, विचार और संस्कार उनके पिता रामजी की ही देन है। इसके कई उदाहरण हमे उनकी जीवन गाथा में दिखाई देते है। रामजी बाबा का व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक और प्रभावशाली था। वे बहुत ही अनुशासन प्रिय थे। साथ ही ज्ञान की भूख ने ही उन्हें पुस्तक प्रेमी बनाया था और यही भूख उन्होंने अपने बेटे भीमराव में भी जगाई थी।

वे ब्रिटिश लश्कर की पाठशाला में मुख्य अध्यापक के पद पर कार्य कर चुके थे। सेवा निवृत्ति के बाद भी उनके भीतर का शिक्षक जिंदा था, इसलिए वे अपने बेटे के पिता होने के साथ साथ शिक्षक और मार्गदर्शक भी बने।

अछूत माने जाने वाले जाती से होने के कारण उन्हें जीवन भर कई प्रकार की प्रताड़नाओं का सामना करना पड़ा था। किन्तु कुशाग्र बुद्धि और स्वयं पर विश्वास से उनमें अदम्य साहस का संचार होता था। ब्रिटिश आर्मी में वे महार रेजिमेंट में वे सूबेदार के पद पर पहुंचे थे। कई महारो को इस रेजिमेंट की नौकरी से जीवन में सुधार और उन्नति का अच्छा मौका मिला था, इसे देखकर ब्राह्मणों के मन में द्वेष पैदा हुआ और उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से मिलकर महार रेजिमेंट को समाप्त करने का षड़यंत्र रचा। इसके विरोध में रामजी बाबा ने अभियान चलाया था। वे महारो को आर्मी में लेने के लिए लगातार ब्रिटिशों से संघर्ष करते रहे। इस घटना से हमे रामजी बाबा के समाज के प्रति क्रांतिकारी भावनाओ का अंदाज़ा हो जाता है। उनके भीतर प्रचलित विषमता वादी समाज व्यवस्था के प्रति एक आक्रोश था। वे व्यवस्था द्वारा दिए गए निम्न सामाजिक स्तर और छुआछुत के घोर विरोधी थे। इस व्यवस्था को बदलने की महत्वाकांक्षा उनके मन में घर कर गई थी इसी महत्वाकांक्षा को उन्होंने अपने बेटे भीमराव के मन में भी जगाया।

महाराष्ट्र के सतारा में जब बालक भिवा के साथ पाठशाला में, गाव में, राह में, कदम कदम पर जब छुआछूत और अन्याय होता था तब भीवा को बहुत क्रोध आता था, उनका मन करता था कि वह इस अत्याचार का इस अपमान का बदला उसी समय उन्हें मारकर ले, शारीरिक बल से वे अपने अपमान का बदला लेने की कोशिश करते थे किन्तु रामजी बाबा उन्हें समझाते थे कि यहां अत्याचारी एक नही अनेक है, यह एक व्यक्ति नहीं, बल्कि सोच है, जो विषमता वादी व्यवस्था का निर्माण करती है। किसी एक को मारने से यह सोच खत्म नहीं होगी। इसे खत्म करने के लिए शिक्षा लेना, ज्ञानी बनना बहुत ज़रूरी है। इसके लिए खूब पढ़ने कि लालसा उन्होंने भीवा के मन में पैदा की।

उनके पास पढ़ाने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे, इसके बावजूद उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा का गला कभी नहीं घोंटा। वे लगातार कहीं न कहीं से पैसे जुटाने की कोशिश करते थे। कई बार अपनी विवाहित बेटी के गहनों को गिरवी रखकर पुस्तके खरीदी गई। कई बार बुढ़ापे की परवाह न करते हुए, मजदूरी की और बोझा भी ढ़ोया। वे भूखे रहकर भी अपने बेटे को खूब पढ़ाना चाहते थे। इसलिए नहीं कि पढ़ लिखकर उसे बड़े वेतन की नौकरी मिले और वे सुखी संपन्न हो, बल्कि उन्हें इसलिए पढ़ाना चाहते थे कि पढ़ लिखकर अपने शोषित, पीड़ित समाज के अधिकार के लिए वैचारिक संघर्ष कर सके। उन्हें उनके अधिकार दिला सके, समाज में परिवर्तन ला सके।

अपने इस महान उद्देश्य के लिए उन्होंने कभी भी शॉर्टकट का रास्ता नहीं अपनाया। अनैतिकता या झूठ को कभी प्रोत्साहित नहीं किया।

एक बार की बात है, उस समय रामजी बंबई की एक चाल में रहते थे और भीवा उस समय बंबई की पाठशाला में पढ़ने जाते थे। वह पाठशाला घर से काफी दूर थी इसलिए गाड़ी से जाने के लिए रामजी भीवा को गाड़ी भाड़ा रोज देते थे। उस समय भीवा को नेपोलियन का जीवन चरित्र पढ़ना था और वह पुस्तक खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। तब एक दोस्त ने उन्हें सलाह दी कि वह बिना टिकट गाड़ी से प्रवास करे और उन पैसों को बचाकर फिर उससे पुस्तक खरीदे।

भीवा को जब रोज घर पहुंचने के लिए देरी होने लगी तब यह बात खुली। सर्व प्रथम तो रामजी को लगा, उनका बेटा बिना टिकट यात्रा करता है, किन्तु सच्चाई यह थी कि भीवा पैसा बचाने के लिए प्रतिदिन पैदल यात्रा कर रहा था ताकि उससे नेपोलियन की किताब खरीद सके। किन्तु मित्रो के कहने पर भी भीवा ने बिना टिकट यात्रा करना उचित नहीं समझा। पिता और पुत्र दोनों ही नैतिकता की मिसाल थे।

एक बार बालक भीवा ने बॉल से निशाने बाज़ी का अभ्यास करने के लिए रामजी बाबा के हस्तलिखित पुस्तकों को निशाना बनाया, जिससे सारी पुस्तके, उसके पन्ने पन्ने बिखर गए, तब रामजी बाबा ने उन्हें सजा दी कि जबतक वह सारे पन्नों को व्यवस्थित क्रम में नहीं लगाएंगे तब तक उन्हें भोजन नहीं दिया जाएगा। बड़े होने के बाद भीवा ने इसी घटना का उदाहरण देते हुए, चाल के दूसरे बच्चो को यही गलती करने पर समझाया कि उनके पिता ने उन्हें कैसे पुस्तकों का महत्व समझाया था। पुस्तके ही उनके जीवन को दिशा देकर उनकी दशा बदलती है। इनकी हमे इज्जत करने चाहिए।

कहने को तो बहुत से उदाहरण है जो यही प्रमाणित करते है की रामजी बाबा ने एक आदर्श पिता के रूप में भीमराव को जीवन के मूल्यवान सिद्धांत दिए। व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिए कार्य करने कि भावना का उनमें संचार किया, जिसका आज हम सुखद परिणाम देख रहे है। रामजी बाबा ने भीमराव का पिता बनकर भीमराव को समाज का पिता बनाया, इसलिए हम कहते है वो हमारे पिता के पिता है।


Bhikkhuni Vijaya Maitriya is an Author and a social activist.

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