राम मंदिर का भूमि पूजन : हेडगेवार जीते, कांशीराम हारे!

-एच.एल.दुसाध





आज 5 अगस्त, 2020 है, जो हिन्दू भारत के इतिहास में एक ऐतिहासिक दिवस के रूप में चिन्हित होने जा रहा है। इस ऐतिहासिक दिवस पर उस राम मंदिर निर्माण का आरंभ होने जा रहा है, जो इसके निर्माण का अभियान चलाने वाले संघियों के अनुसार करोड़ों भारतीयों की कालजयी आस्था और गौरव का प्रतीक है। 70 एकड़ के परिसर में 161 फीट ऊंचा राम मंदिर का निर्माण बमुश्किल एक एकड़ में होगा, जिसका आरंभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज दोपहर 12.30 किया। हालांकि एकाधिक कारणों से प्रधानमंत्री द्वारा यह कार्यक्रम करने से भारी संख्यक लोगों को आपत्ति है। खैर, आखिर बहूजनो का एक बड़ा तपका इस मंदिर निर्माण में खुशियां मना रहा है; हेडगेवारवाद, मान्यवर कांशीरामजी की विचारधारा को लोगो के दिमाग से किस तरह साफ कर जीत गए इसपर एक नजर डालते है।


संघ संस्थापक डॉ. हेड्गेवार के बिना अधूरी है: राम मंदिर निर्माण या भाजपा के सफलता की चर्चा

बहरहाल आडवाणी की उपेक्षा की ओर राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान जरूर गया है, पर, अनदेखी के लिहाज से एक और शख्स है , जिसकी 5 अगस्त के ऐतिहासिक आयोजन मे बुरी तरह अनदेखी हुई है. यह शख्स हालांकि जीवित नहीं : उसने मंदिर आंदोलन में कोई सक्रिय भूमिका भी नहीं अदा की है. बावजूद इसके आज अगर भव्य राम मंदिर का शिलान्यास हुआ है तो विचार के रूप में सदियों तक जीवित रहने की कूवत रखने वाले उस शख्स की राममंदिर निर्माण में परोक्ष भूमिका को कभी नहीं भुलाया जा सकता. लेकिन हैरत की बात है कि विगत कुछ सप्ताहों से जो तमाम चैनल दिन ब दिन विकराल रूप धारण करते कोरोना की अनदेखी कर डिबेट को राम मंदिर निर्माण के भूमि पर केन्द्रित किए हुये थे, उनमें शायद ही किसी ने आधा घंटा भी समय संघ संस्थापक हेडगेवार के लिए दिया होगा। इसी तरह प्रिंट मीडिया में भूमि पूजन पर जो हजारों पन्नें रंगे गए, उनमें शायद ही 10 पन्ने भी हेडगेवार पर खर्च किए गए होंगे। जबकि सच्चाई है चाहे राम मंदिर का निर्माण हो या राज्यों से लेकर केंद्र तक भाजपा की सत्ता : किसी पर भी चर्चा हेडगेवार के बिना अधूरी है। बहरहाल राम मंदिर आंदोलन हो या भाजपा की बेहिस्साब सत्ता, हेड्गेवार की प्रभावकारिता का आंकलन करने के लिए 1925 के दौर में लौटना होगा।


संघ की स्थापना के पीछे : हेड्गेवार की परिकल्पना

1925 के पूर्व दिनों में हालात बड़ी तेजी से ब्राह्मणों के विरुद्ध होने लगे थे. उन दिनों अग्रणीय ब्राह्मण विद्वान लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में ब्राह्मणों को विदेशी प्रमाणित करने की होड़ तुंग पर पहुँच चुकी थी.1922 में सिन्धु-सभ्यता के सत्यान्वेषण ने भारत में प्राचीनतम विदेशागत लोगों के आगमन की पुष्टि कर दी थी. उधर सिन्धु सभ्यता के सत्यान्वेषण और ज्योतिबा फुले के आर्य–अनार्य सिद्धांत से प्रेरित ई. व्ही. रामास्वामी नायकर पेरियार दक्षिण भारत में आर्य-द्रविड़ सिद्धांत का प्रचार कर ब्राह्मण सत्ता के विनाश की आधारशिला तैयार करना शुरू कर चुके थे। इस दौरान ब्रिटेन में 30 वर्ष से ऊपर की महिलाओं के मताधिकार का कानून पास हो चुका था। इन सारे हालातों पर किसी की सजग दृष्टि थी तो बंगाल की ‘अनुशीलन समिति’, जिसमें शुद्रातिशूद्रों का प्रवेश पूरी तरह निषिद्ध था, के पूर्व सदस्य हेडगेवार की। उन्हें यह अनुमान लगाने में कोई दिक्कत नहीं हुई कि अग्रेजों के चले जाने के बाद भारत में भी संसदीय प्रणाली लागू होगी, जिसमें विशिष्टजन ही नहीं, भूखे-अधनंगे दलित-पिछड़ों को भी वोट देने, अपना प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलेगा। वोटाधिकार मिलने पर दलित-आदिवासी और पिछड़े और चाहें जो कुछ भी करें,अंततः तिलक-नेहरु इत्यादि द्वारा विदेशी प्रमाणित किये गए ब्राह्मणों को वोट तो नहीं ही देंगे। इसी चिंता से ही, जिन दिनों देश के दूसरे नेता आजादी की जंग लड़ रहे थे, उन्होंने आजाद भारत के ब्राह्मणों के हित में मुस्लिम-विद्वेष और हिन्दू-धर्म-संस्कृति के उज्जवल पक्ष के प्रचार-प्रसार के जरिये विशाल हिन्दू समाज बनाने में खुद को निमग्न किया। उन्होंने अपनी प्रखर मनीषा से यह जान लिया था कि जो दलित-पिछड़े हिन्दू-धर्म के अनुपालन के नाम पर सदियों से पशुवत जिंदगी जीते रहे हैं, उन्हें जब मुस्लिम विद्वेष और हिन्दू-धर्म के नाम पर उद्वेलित किया जायेगा, वे आसानी से हिन्दू के नाम पर ध्रुवीकृत हो जायेंगे, और जब असंख्य जातियों में बंटे लोग हिन्दू के नाम पर ध्रुवीकृत होंगे, नेतृत्व स्वतः ही ब्राहमणों के हाथ में चला जायेगा. इसी सोच के तहत उन्होंने विशाल हिन्दू समाज बनाने के लिए 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी।


राम जन्मभूमि मुक्ति के नाम पर संघ ने खड़ा किया : आज़ाद भारत का सबसे बड़ा बवाल


डॉ. हेडगेवार से यह गुरुमंत्र पा कर संघ अरसे से चुपचाप काम करता रहा। किन्तु 7 अगस्त, 1990 को मंडल रिपोर्ट सामने आने के बाद जब दलित-पिछड़ों के हाथ में सत्ता के जाने के आसार दिखा, संघ ने अपने तीन दर्जन आनुषांगिक संगठनों के साथ मिलकर राम जन्मभूमि मुक्ति के नाम पर आजाद भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिया। इस आन्दोलन में संघ परिवार ने मुसलमानों के प्रति वंचित जातियों में वर्षों से संचित अपार नफरत और राम के प्रति दुर्बलता का जमकर सद्व्यवहार किया। परिणाम सबको मालूम है। इस मसले को दूर से निहारते रहने वाले ब्राह्मण अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दू-ध्रुवीकरण की नैया पर सवार होकर केंद्र की सत्ता पर काबिज हुए। राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन की सफलता के बाद संघ परिवार चुनाव दर चुनाव विकास की आड़ में प्रधानतः हिन्दू ध्रुवीकरण के सहारे सत्ता दखल की मंजिलें तय करता गया। बहरहाल संघ संस्थापक की दूरगामी परिकल्पना को किसी ने समझा तो वह थे कांशीराम.


हेड्गेवार की काट पैदा किए : मान्यवर कांशीराम


कांशीराम ने जब सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य का अध्ययन किया तो उन्हें विशाल ‘हिन्दू समाज’ के विपरीत ‘बहुजन समाज’ बनाने से भिन्न कोई उपाय नजर नहीं आया। उन्होंने हेडगेवार के फार्मूले से यह जान लिया कि अगर हिन्दू धर्म-संकृति के उज्जवल पक्ष और अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत के जरिये वंचित जातियों को हिन्दू के नाम पर गोलबंद कर नेतृत्व यदि ब्राह्मण व सवर्णों के हाथ में थमाया जा सकता है तो हिन्दू –धर्म –संस्कृति के अंधकार पक्ष अर्थात वर्ण व्यवस्था की वंचना और व्यवस्था के लाभान्वित वर्ग के खिलाफ वंचितों को आक्रोशित कर विशाल बहुजन समाज बनाया जा सकता है। ऐसा होने पर सत्ता की बागडोर अवश्य ही दलित-आदिवासी –पिछडों या इनसे धर्मान्तरित लोगों के हाथ में थमाई जा सकती है।


हालांकि कांशीराम ने यह कभी कबूल नहीं किया कि उन्होंने हेडगेवार का अनुसरण किया है, लेकिन उनकी कार्य प्रणाली में उसकी झलक मिलती है। चूंकि कार्य प्रणाली एक होने के बावजूद ‘विशाल हिन्दू-समाज' और 'बहुजन समाज' दो विपरीत ध्रुव हैं, इसलिए उनका उल्टा फार्मूला ही एक दूसरे के खिलाफ रास आता है। यही कारण है कि भारतीय समाज का लम्बे समय तक अध्ययन करने के बाद जब कांशीराम ने 6 दिसंबर 1978 को बामसेफ (आल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनरिटीज इम्प्लायज फेडरेशन) नामक अपंजीकृत, गैर-धार्मिक, गैर-आन्दोलानात्मक और गैर-राजनीतिक संगठन बनाया तो हेडगेवार जिस आर्य-अनार्य सिद्धांत से अपने समाज को बचाना चाहते थे, उसको प्रधानता देने से वे खुद को रोक नहीं पाए।


बामसेफ बनाम संघ


हाँ! हेडगेवार और मान्यवर कांशीराम जी ने अपने-अपने सपनों के भारत निर्माण के जो वैचारिक संगठन तैयार किया उनमें एक ही साम्यता रही कि दोनों ही घोषित तौर पर अराजनैतिक संगठन रहे, पर मूल मकसद राजनीतिक रहा। इस मकसद को हासिल करने के लिए संघ जहां वंचितों की धार्मिक चेतना के राजनीतीकरण पर सक्रिय रहा, वहीँ बामसेफ वर्ण-व्यवस्था के वंचितों की जाति चेतना पर। संघ जहां अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुस्लिमों के खिलाफ नफरत को हथियार बनाया, वहीँ बामसेफ शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक –धार्मिक-शैक्षिक ) पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा जमाये सवर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों के खिलाफ बहुजनों को संगठित करने का हर मुमकिन प्रयास किया। हां, बामसेफ ने भी संघ की तर्ज पर जागृति जत्था, बामसेफ सहकारिता, समाचार पत्र एवं प्रकाशन, संसदीय संपर्क शाखा, विधिक सहयोग एवं सलाह, विद्यार्थी, युवक, महिलाएं, औद्योगिक श्रमिक, खेतिहर श्रमिक इत्यादि जैसे कई विंग स्थापित किये। इनके जरिये ही कांशीराम ने योजनाबद्ध तरीके से पहले दलितों की जाति चेतना का राजनीतिकरण किया जो धीरे-धीरे पिछड़ों और अल्पसंख्यकों तक में प्रसारित हो गयी। इसके फलस्वरूप मंडल उत्तर काल में सवर्ण राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील होने के लिए बाध्य हुए। यह कांशीराम जी की जाति चेतना की रणनीति का ही कमाल था कि तमाम राजनीतिक दल, जिनमें संघ का राजनीतिक संगठन भाजपा भी है, नेतृत्व गैर-ब्राह्मणों, विशेषकर पिछड़ों के हाथ में देने के लिए बाध्य हुए।


कांशीरामवाद से विचलन का परिणाम: राम मंदिर और भाजपा की सत्ता


बहरहाल सवर्णवादी दलों की लाचारी दीर्घ स्थाई न हो सकी। कारण, जाति चेतना के चलते क्षत्रप बने बहुजन समाज के नेता 2009 आते-आते अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए सवर्णपरस्ती की राह पकड़ लिए। अब उनमें सवर्णों के खिलाफ बहुजनों को ध्रुवीकृत करने का जज्बा ही नहीं रहा। इस कारण बहुजन नेतृत्व ‘भूरा बाल..तिलक तराजू..इत्यादि जैसे उन नारों से तौबा कर लिया, जो बहुजनों की जाति चेतना के राजनीतिकरण में प्रभावी रोल अदा किया करते थे। उन नारों से बहुजनों का भारत के जन्मजात शोषक वर्ग के खिलाफ एक नफरत सैलाब उमड़ता था, जो बहुजन नेताओं के चुनाव में विजय का बड़ा सबब बनता, लेकिन बहुजनवादी दल भले ही शोषकों के खिलाफ नफरत का सैलाब पैदा करने वाले नारों और राजनीतिक शैली से तौबा कर लिए; किन्तु घोषित तौर पर विकास की बात करनेवाले संघवादी डॉ. हेडगेवार के फार्मूले से कभी डिगे नहीं। इसलिए उनका धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण से कभी विचलन नहीं हुआ। वे राजनीतिक रूप से बेहतर स्थिति में आते जाने के बावजूद कभी मुस्लिम विद्वेष के प्रसार से पीछे नहीं हटे। यही कारण है 2014 से हेडगेवारपंथी हिंदी पट्टी की राजनीति में नए सिरे से छाते चले गए। हेडगेवार के अल्पसंख्यक विद्वेष वाले फार्मूले को लगातार धार देते रहने के कारण ही भारत दुनिया के सबसे बड़े मॉब लिंचिंग सेंटर में विकसित होते गया; साथ-साथ बढ़ते गया हेडगेवार के आरएसएस के राजनीतिक संगठन भाजपा की राजनीतिक सफलता का ग्राफ।

नए सिरे से धार देना होगा कांशीरामवाद को


बहरहाल आज से जो राम मंदिर निर्माण शुरू हो रहा है, उसके बाद बहुत से व्यक्ति आश्वस्त हो सकते हैं कि राम मंदिर का मुद्दा खत्महो गया, जैसे कि नरसिंह राव ने 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद बेफिक्र हो गए थे। किन्तु राम मंदिर जिस तरह सवर्णवादी सत्ता के लिए कारगर साबित हुआ है, उसे देखते हुये यह मानकर चलना ही बेहतर होतर होगा कि संघ परिवार विविध बहानों के जरिये मंदिर निर्माण का घोषित कार्यकाल साढ़े तीन साल को बढ़ाकर कमसे से कम आगामी दो लोकसभा चुनाव अर्थात और 10 वर्षों तक जरूर कर लेगा। स्मरण रहे मंदिर निर्माण से जुड़े लोग धन-संग्रह के लिए 10 करोड़ परिवारों से संपर्क साधने की योजना बना चुके हैं। इस संपर्क परियोजना को पूरे करने मे कितने साल लग सकते हैं, यह कल्पना करने का विषय है। याद रहे 70 एकड़ में फैले मंदिर परिसर में नाम मात्र क्षेत्र के ही फिलहाल निर्माण की घोषणा हुई है। बाद मे इसका निर्माण क्षेत्र 35 एकड़ तक नहीं बढ़ जाएगा, इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता। इसलिए यह मानकर चलिये कि आरक्षण के खात्मे के लिए सितंबर, 1990 से एल के आडवाणी ने जिस राम जन्मभूमि मुक्ति अभियान की शुरुआत की, वह अभी और कई सालों तक, तब तक चलेगा, जब तक आरक्षण बिलकुल शून्य नहीं हो जाता । इसका मतलब हिन्दू धर्म संस्कृति के उज्ज्वल पक्ष और मुस्लिम विद्वेष का प्रसार अर्थात हेड्गेवारवाद अभी और कई सालों तक चलेगा। चूंकि हेडगेवार की काट सिर्फ कांशीरामवाद में है इसलिए वक्त की मांग है कि सभी सामाजिक न्यायवादी दल संगठित होकर कांशीरामवाद को और प्रभावी बनाने की दिशा में आगे बढ़ें.यदि सामाजिक न्यायवादी दल संगठित होकर इमानदारी से दलित, आदिवासी, पिछड़ों और मुसलमानों के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों सहित सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग, परिवहन, फिल्म-मीडिया, ज्ञान-उद्योग और पौरोहित्य इत्यादि तमाम क्षेत्रों में संख्यानुपात में भागीदारी की मांग उठायें तो इससे जाति चेतना का वह सैलाब उठेगा जिसके सामने धार्मिक चेतना पर निर्भर राजनीति तिनके की भांति बह जाएगी। पर लाख टके का सवाल है कि बहुजन नेता क्या कांशीरामवाद को नए सिरे से धार देने की दिशा में आगे बढ़ेंगे!


लेखक एच एल दुसाध, बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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